कविताओं का अकेलापन

'कविताएं' जानती रही हैं
दुख में मेरे अस्तित्व की सम्पूर्णता
वे मेरे एकाकीपन को भंग नहीं करतीं
बस, मुझे स्पर्श करती हैं
और विदा हो जाती हैं

'कविताएं' जानती हैं मुझे
जैसे मैं पहचानती हूं उन्हें
वे भांप लेती हैं मेरी सुन्दर उदासी
और मैं भी समझ पाती हूं
इस खबरनवीस दौर में
कविताओं का अकेलापन!

स्त्री

जब किसी खाली दुपहरी में उगी
तुम्हारे भीतर विद्रोह की सूखी ललक
जागा खुद के खोखला होने का मुट्ठी भर एहसास
तुम ने सब घर वालों के मैले कपड़ों 
और झूठे बर्तनों में उसे तत्काल धो डाला

क्षणिकाएं


घर - 
जब भी लिखा या बोला गया ‘घर’ शब्द 
एक दृश्य मेरी आंखों के कोरों पर आकर ठहरा रहा
बरामदे में बैठे अखबार पढ़ते पिता और रसोई में चाय बनाती मां
मैने सदा चाहा कि कम से कम एक सुबह के लिए यह दृश्य उलट - पलट जाए
चाय पत्ती उबालें पिता और अखबार की सुर्खियां पढ़ सुनाए मां।

हाशिए - 
मुख्य पन्नों पर वीर रस से भरी
तुम्हारी आत्म कथाएं लिखी जाने के उपरान्त
महज हाशिए बचे रह गए मेरे हिस्से में
जहां मैं छोटी छोटी कहानियों और आसान पंक्तियों में
समेटूंगी अपने तमाम दुख और संघर्ष।

दुख - 
सुख हमेशा रहता है 
मुझ से छिटक जाने की जल्दी में 
दुख लिपटा रहता है 
जाने की हड़बड़ी में नहीं होता वह
मैं दुख को सुख की तरह चाहना सीख रही हूं।

शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

तुम उपस्थित हो 
मेरे ठीक सामने
देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना
शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे

मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है
अकेलेपन की महसूसियत
जो अब भीतर उतरती जाती है
वह मेरे साथ अधिक है
तुम से भी अधिक 

दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में
वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप
और अब मेरे निकट यूं रहना
उसका स्वभाव हो चला है
एक बुरा - सा स्वभाव

मैं देख सकती हूं 
तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट
शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती 
हम एक अजीब समय खण्ड में आ पहुचे हैं
जहां एक दूसरे को पहचानना भूलता जाता है
बीच के किसी रिक्त बिन्दु पर जगह पाकर
पसर गया है अकेलापन
जरा देर के लिए गौर से सुनो
तुम उसे सुन सकते हो मेरे मौन में!

जयपुर इन लव

 डेली न्यूज के बुधवार परिशिष्ट ‘खुशबू’ में प्रकाशित ( 25 जून 2014)

 

बदलाव जीवन का स्थाई नियम है, स्वाभाविक भी। कुछ बदलावों को समय भीतर आने देता है, कुछ के साथ यह सहज नहीं हो पाता। जो प्रेम कुछ बरसों पहले तक कमरों में बंद था, अब निकल कर गलियों और सड़कों पर दिखने लगा है। हाथ में हाथ थामे बतियाए हुए। गलबहियां डाले सैर करते हुए। समय की प्राचीन दीवारें प्रेम की आजाद अभिव्यक्ति को स्वीकारने में संकोच कर रही हैं। लेकिन, प्रेम हवा की मानिंद उड़ता जा रहा है। समय उसे जितना बांधने का प्रयास करेगा, वह छूटने को उतना ही कसमसाएगा। ये कसमसाहटें बढ़ रही हैं और सांस्कृतिक उहापोह भी।

स्त्री – पुरुष संबंध नए आयाम गढ़ रहे हैं। प्रेम और विवाह के प्रतिमान तेजी से बदल रहे हैं। यौन संबंधों की वर्जनाएं चरमराने लगी हैं। यह सामाजिक और सांस्कृतिक उथल – पुथल की स्थिति है। उभरती लेखिका इरा त्रिवेदी की बहुचर्चित रही हालिया किताब “इंडिया इन लव: मैरिज एंड सेक्सुएलिटी इन ट्वेन्टिअथ सेंचुरी” में वे स्पष्ट कहती हैं कि भारत में स्त्री – पुरुष संबंधों में जितना बदलाव पिछले दशक में हुआ है, उतना सम्भवतया बीते तीन हजार सालों में भी नहीं देखा गया। इरा ने किताब लिखने से पहले भारत के कई शहरों के लोगों से खुल कर बात की और यह जाना कि देश, खास कर शहरी तबका एक सामाजिक क्रांति की दहलीज पर बैठा हुआ है। अरेंज्ड शादियों के प्रति रुझान घटा है। विवाह में बंधने की औसत उम्र बढ़ी है। प्रेम और संबंधों के नए प्रतिमानों की न सिर्फ खोज हो रही है, बल्कि उन पर नए परीक्षण भी हो रहे हैं। यह दीगर है कि इससे पीढ़ियों में संघर्ष और तनाव उभरने लगा है।

कैसा भी बदलाव हो, वह अपने साथ कुछ बुरे असर भी जरूर लाता है। विवाहित जोड़ों में अलगाव और तलाक के मामले चिंताजनक रूप से बढ़ते देखे जा रहे हैं। इरा का मानना है कि विवाह पूर्व यौन संबंध सामान्य होते जा रहे हैं। साथ ही यह भी सच है कि किशोरियों के गर्भधारण और गर्भपात भी बढ़े हैं।

 

प्रेम को लेकर असहज है समाज!

शुद्ध देसी रोमांस फिल्म का वह दृश्य याद कीजिए, जहां लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाला नायक, एक पड़ौसी से टकराने पर सकपकाता हुआ कहता है कि वह अपनी बहन से मिलने आया है। छोटे शहर का लड़का, प्रेमिका को बहन कह देता है। समाज प्रेम संबंधों के साथ सहज नहीं हो सका है। “इंडिया इन लव: मैरिज एंड सेक्सुएलिटी इन ट्वेन्टिअथ सेंचुरी” में इरा लिखती हैं कि भारत का तेजी से वैश्वीकरण हो रहा है। यहां जो विदेशी कंपनियां आ रही हैं, वे न सिर्फ नौकरियां ला रही हैं, बल्कि कई सांस्कृतिक बदलाव भी ला रही हैं।

सामाजिक विषयक रचनाकार इंडियन होम मेकर का कहना है कि भारतीय समाज अब भी प्रेम विवाहों को लेकर संदेह से घिरा है। जिस समाज में स्त्री – पुरुषों को दूर रखे जाने की भरसक कवायद की जाती हो, वहां प्रेम विवाह सहज कैसे हो सकते हैं! अमूमन घरों में बेटियों को परिवार का ‘सम्मान’ मानकर पाला जाता है, ऐसे में उनके प्रेम करने पर परिवार को वह सम्मान भंग होता हुआ महसूस होता है। कॉलेज प्राध्यापिका गीता गर्वा कहती हैं कि पहले स्त्रियां शोषित होते रहने के बावजूद चुप्पी नहीं तोड़ती थीं, लेकिन अब उनकी आवाजें सुनाई पड़ने लगी हैं। वे अपने फैसले खुद लेना चाहती हैं और सही साथी नहीं मिलने पर थोपे हुए विवाह के बजाय, अकेले रहने को प्राथमिकता पर रखती हैं। यह दीगर है कि आज भी अमूमन परिवार अपना फैसला सुनाने वाली स्त्रियों के साथ नहीं खड़े होते। प्रेम विवाहों के टूटने का एक बहुत बड़ा कारण परिवार और समाज का इनसे अलग – थलग हो जाना भी है।

 

विवाह के फैसले पर असमंजस में युवा!

अरेंज्ड शादी करने में क्या समस्या है? इस पर गीता जवाब देती हैं कि अमूमन एक – दो मुलाकात में कोई भी व्यक्ति बहुत बनावट के साथ बर्ताव करता है। उसका असल व्यक्तित्व सामने नहीं आ पाता। फिर यह कैसे तय किया जाए कि उससे विवाह किया जा सकता है या नहीं? प्रेम विवाह में दोनों एक दूसरे को जानते हैं और विश्वास कर सकते हैं। एक सामाजिक संस्था से जुड़ी पायल शर्मा मानती हैं कि जबरन या थोपा गया विवाह दुर्घटना नहीं, बल्कि त्रासदी है। यह सच है कि विवाह के प्रति अवधारणाएं बदल रही हैं। स्त्रियां अपने कार्य और जीवन को लेकर कुछ गम्भीर हुई हैं। हालिया, जबलपुर में एक लड़की ने अपनी बारात लौटा दी क्यूंकि वर पक्ष के लोग विवाह समारोह में ही अश्लील हरकतें करने लगे थे। छोटे शहरों में भी युवा महत्वाकांक्षी हो रहे हैं। अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही विवाह करने का फैसला लेने का प्रचलन बढ़ा है।

 

देख – भांप कर चुने जीवनसाथी

सोशल एक्टिविस्ट और स्प्रिचुअल कांउसलर रेखा सिंह के मुताबिक समय के साथ परिवारों की सोच भी करवट ले रही है। स्वयं एक मां होते हुए, रेखा मानती हैं कि माता – पिता बच्चों की खुशी चाहते हैं और उनकी पसंद के जीवन साथी को सहमति भी देने लगे हैं। वे महज इतना आश्वस्त होना चाहते हैं कि उनकी बेटी जिसे चुन रही है, वह उसके लिए उपयुक्त है या नहीं। टैरो कार्ड रीडिंग्स में अनुभवी रेखा का मानना है कि कई मर्तबा लड़कियां जज्बाती होकर गलत फैसला ले लेती हैं। जरूरत है कि वे पूरी तरह आंखें खोलकर निर्णय लें। यह उनके समूचे जीवन का प्रश्न होता है। ऐसे में उन्हें सावधान रहना जरूरी है।

रेखा का मानना है कि विवाह सुख और साथ पाने के लिए किया जाता है, चाहे अरेंज्ड हो या लव मैरिज। यह विवाह करने वाले दोनों व्यक्तियों पर निर्भर करता है कि वे कितनी परस्पर समझ से अपना प्रेम और संबंध बनाए रख पाते हैं।

 

दोनों पीढ़ियों में बने संवाद

यदि किशोरावस्था में ही लड़की प्रेम संबंध में हो, तो ऐसे में माता – पिता उसे कैसे समझाएं? इंडियन होम मेकर मानती हैं कि माता – पिता को खुला रवैया रखना होगा। अपने निर्णय थोपने की जगह संवाद और समझाइश को तवज्जो दें। उन्हें ये समझने की जरूरत है कि उनके बच्चे अब युवा हो रहे हैं। किसी स्थिति में, बेटे – बेटियों के निर्णय गलत साबित हों, तब भी दोष डालने की बजाय समझाइश होनी चाहिए। परिवारों को यह देखना होगा कि क्या ज्यादा अहम है – सामाजिक दायरे या उनके बच्चों की खुशी?

भारत में विवाह एक संस्कार है। मैरिज काउंसलर सरायु चन्द्रशेखर मानती हैं कि विवाह दो व्यक्तियों से ज्यादा, दो परिवारों का मिलन है। इस स्थिति में विवाह के बाद दुखी रहने के बावजूद इसे बनाए रखने का दबाव होता है। विवाह के टूटने को परिवार के अपमान की तरह देखा जाता है। विशेषकर, स्त्रियों को अरेंज्ड शादियों में समझौते करते रहने की समझाइश की जाती है। वहीं, दूसरी ओर प्रेम विवाह होने की स्थिति में एक दूसरे से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं और अहंकारों का टकराव होता है।

प्रश्न यह है कि इस सांस्कृतिक विचलन का सुलझाव क्या है? युवा पूरी तरह न तो यूरोपीयन संस्कृति को अपना पा रहे हैं, ना ही प्राचीन भारतीय मूल्यों से सामंजस्य बना पा रहे हैं। जहां युवाओं को संबंधों में समझ से काम लेना होगा, वहीं पुरानी पीढ़ी को कुछ कदम आगे आना होगा। तभी कोई मध्य मार्ग निकलेगा, जहां दोनों के बीच की खाई को पाटा जा सके।

 

(स्टोरी इस लिंक पर उपलब्ध है)

http://dailynewsnetwork.epapr.in/293875/khushboo/25-06-2014#page/1/2

 

शोर तुम्हारे भीतर है

 

– ओह, कैसा अजीब शहर है न यह! अलसुबह ही शोर होने लगता है। देर रात तक भी गाड़ियों के आने – जाने की आवाजें आती रहीं। मैं तो सो ही नहीं सकी, मृदुल।

– मैं भी कहां सो पाया।

– झूठ न कहो, खर्राटे भर रहे थे तुम पूरी रात। कुछ तो गाड़ियों के शोर और कुछ तुम्हारे खर्राटों की आवाज ने बिल्कुल आंख नहीं लगने दी।

– मैं कहां खर्राटे लेता हूं, संध्या।

– तुम्हे क्या होश? तुम तो घोड़े बेचकर सो रहे होते हो। मैं कह रही हूं न, तुम्हारे खर्राटे तो इतने भयानक होते हैं कि मुर्दे को खड़ा कर दें।

– जब मुझसे इतनी ही परेशानी हो रही थी, तो दूसरे कमरे में सो जाती।

– वहां भी जाकर लेटी थी। वहां तो गाड़ियों की आवाजें और भी तेज आ रही थी। उस पर, गली के सारे कुत्तों को ना मालूम, रात को क्या हो जाता है? उतना भौंकते हैं कि पूछो मत…और ये घड़ी की टिक – टिक भी क्या कम सताती है। पंखा भी कितनी आवाज कर रहा है, कुछ दिनों से। किसी इलेक्ट्रिशियन को क्यों नहीं बुलाते?

– तुम जरा लंबी सांस भर कर सोने की कोशिश किया करो, संध्या। ये आवाजें मेरी नींद में खलल नहीं डालती। तुम इतना सोचती हो इन सब के बारे में…इसीलिए ये उलझाव तुम्हे सोने नहीं देते।

– अरे, तुम भी कैसी बात करते हो? सोने की कोशिश तो करती ही हूं न। लेकिन नींद पास ही नहीं फटकती, तो जबरन कैसे सोऊं?

– इस तरह सो नहीं सकोगी, तो बीमार पड़ जाओगी।

– लेकिन करूं क्या। कोई मेरी बेचैनी समझता ही नहीं। तुम भी नहीं।

– ऐसा मत कहो, संध्या। मैं समझता हूं, लेकिन इससे बाहर तो तुम्हे खुद ही निकलना होगा। मैं, बस तुम्हारी मदद कर सकता हूं।

– मृदुल, मेरी एक बात मानोगे?

– कहो तो

– देखो…क्या हम कुछ महीने कहीं दूर जा कर नहीं रह सकते?

– दूर कहां?

– कहीं भी। किसी पहाड़ के पास। आस – पास के किसी छोटे – मोटे स्कूल में पढ़ा लूंगी मैं। तुम भी कुछ काम ढूंढ लेना वहीं। यूं भी, वहां खर्च बहुत कम ही होगा। हम आसानी से अपना गुजारा तो कर ही लेंगे।

– ठीक है, पर क्या होगा वहां जाकर?

– मैं सो पाउंगी, शायद। वहां, ये गाड़ियों की आवाजें कानों में नहीं पड़ेंगी। ये कुत्ते नहीं भौकेंगे। सब शांत होगा चारों ओर। कितना सुकूं मिलेगा। चैन की नींद सो सकूंगी।

– और करेंगे क्या सारा दिन वहां?

– सबसे पहले एक झोपड़ी बनाएंगे। उसमें पानी का एक घड़ा होगा। कुछ बर्तन। एक बिस्तर। बिस्तर पर हरे रंग की चादर बिछाउंगी। फूलों वाली। हम उसी पर सोया करेंगे। फिर सुबह उठ कर मैं चाय बनाउंगी। तुम्हारे पास आउंगी। तुम्हारे माथे को चूम कर तुम्हे उठाउंगी। फिर तुम मेरी अंगुलियों पर अपना हाथ घुमाओगे।  हम दोनों साथ चाय पिएंगे। हालांकि, तब तक चाय ठण्डी हो चुकी होगी।

– ऐसा कुछ नहीं होगा। ये सब तुम्हारे खयाल हैं। वहां भी तुम्हे चैन नहीं मिले, शायद।

– ऐसा कैसे कह सकते हो तुम?

– क्यूंकि तुम अपनी आभासी दुनिया से बाहर नहीं आ रही।

– मतलब?

– मतलब, हम पिछले छह महीनों से एक पहाड़ के पास बनी झोपड़ी में ही रह रहे हैं। पिछले साल, दिसंबर में तुमने ठीक यही कहा था, जो अब कह रही हो। तुम्हारे एक बार कहने पर मैं, सब कुछ छोड़ कर तुम्हे लेकर यहां आ गया था। लेकिन कुछ नहीं बदला, बल्कि और बिगड़ गया है। तुम खो गई हो, खुद के बनाए एक संसार में। तुम्हारा बना संसार एक भ्रम से अधिक कुछ नहीं है। देखो, यहां एक – आधी गाड़ी दिखती है किसी दिन। और तुम्हे हमेशा शिकायत रहती है कि गाड़ियों के हॉर्न की आवाजें बहुत तेज हैं। यहां एक भी कुत्ता नहीं है पास, लेकिन तुम्हे उनके भौकने की आवाजें परेशान करती हैं। घड़ी नहीं टंगी है, किसी भी दीवार पर। लेकिन तुम, उसकी टिक – टिक सुनती हो। पंखा नहीं है यहां। लेकिन तुम उसकी आवाज ठीक करवाने के लिए इलेक्ट्रिशियन को बुलवाना चाहती हो।

– ये सब क्या कह रहे हो, मृदुल? ऐसा कैसे मुमकिन है, भला?

– यही सच है।

– नहीं..फिर, तो इसके मायने यह है कि मैं पागल हो चुकी हूं। मुझे कुछ याद ही नहीं।

– नहीं। पागल नहीं हुई हो तुम। बस, परेशान हो। एक अरसे से सो नहीं सकी हो। कुछ बेचैन हो। जाने क्या मचलता रहता है तुम्हारे भीतर। तुम ने अपनी एक दुनिया रच ली है और उसी को सच मानती हो। शहर की मसरूफियत और आपाधापी की वह दुनिया तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। उससे दूर होने को हम यहां आए, लेकिन तुम उस दुनिया को यहां भी अपने साथ ही ले आई।

– अब क्या करूं मैं? (घबराते हुए)

– तुम्हे निकलना होगा, इससे बाहर।

– कैसे? तुम ही निकाल सकते हो, मुझे। (लगभग रोते हुए)

– नहीं, तुम्हे खुद ही निकलना होगा।

– क्यूं? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते अब? परेशान हो गए हो मुझसे और मेरी बीमारी से?

– नहीं…क्यूंकि मैं हूं ही नहीं।

– मतलब?

– मतलब, मैं जिंदा नहीं हूं। इस दुनिया को अलविदा कहे मुझे एक महीना बीत चुका है। और इस वक्त तुम काली मिट्टी से बनाए चौकोर फ्रेम में सजी मेरी तस्वीर से बात कर रही हो।

– नहीं, पागल मत करो मुझे।

– यही हुआ है।

– तो, तुम मुझ से बात कैसे कर रहे हो फिर?

– मैं बात नहीं कर रहा। मैं कुछ नही कह रहा। तुम सुन रही हो, जैसे दूसरी आवाजें सुनती हो।

– मैं तुम्हारा मरना कैसे भूल सकती हूं? तो, मैं यहां बिल्कुल अकेली हूं?

– नहीं, मैं तुम्हे कभी अकेला नही रहने दूंगा। मैं, तुम में धड़कता हूं हर वक्त। धड़कता रहूंगा। तुम, मुझे हमेशा सुन पाओगी। लेकिन, इस शोरगुल को सुनना बंद करना होगा तुम्हे। शोर तुम्हारे बाहर नही, भीतर है। उस शोर को चुप करना होगा। इन गाड़ियों की आवाजों को चुप करना होगा। इन कुत्तों के भौकने को रोकना होगा। सब कुछ खामोश कर दोगी, तो खुद को खोज पाओगी। खुद में लौट पाओगी। जी पाओगी। तुम्हे इससे बाहर आना होगा और ऐसा सिर्फ तुम ही कर सकोगी। सिर्फ तुम। अकेले।

बुर्का पहन लो

 

रजिया ने टी वी देख रहे अपने शौहर से कहा – सुनिए, आज कहीं घूमने ले चलिए न! कितना सुहाना मौसम है! अभी बारिश होकर रुकी है।

ओहो, तुम भी। अब इस वक्त कहां चलेंगे?

कहीं भी, चलिए…बगल वाले बगीचे में ही ले चलिए न! घंटे भर में लौट आएंगे, फिर खाना लगा दूंगी।

ठीक है। चलो। तैयार हो जाओ।
मैं गुलाबी रंग वाली सलवार – कमीज पहन लूं।

हां, ठीक है। पहन लो और बुर्का जरूर पहन लेना। बगीचे में बहुत लोग होते हैं।

अगला दृश्य –

दोनों बगीचे में गीली घास पर बैठ गए। शौहर ने कहा – देखो रजिया, बारिश के बाद हवा वाकई कितनी अच्छी लग रही है न! मिट्टी से कैसी प्यारी महक आ रही है! बुर्के के भीतर से रजिया ने पलकें झुका कर हां में सिर हिलाया।

क्वीन्स रोड

  डेली न्यूज के बुधवार परिशिष्ट ‘खुशबू’ में प्रकाशित (19 मार्च 2014)

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‘तुम ही तो हो किनारे’…‘क्वीन’ फिल्म के एक गाने की यह पंक्ति जब कानों में घुलती है, तो महसूस होता है कि यह हमारे ही लिए है। हम सब स्त्रियों के लिए। हम जीवन के अमूमन हर मोड़ पर किन्ही दूसरी अंगुलियों की पतवार थाम, अपना किनारा तलाशती हैं। जिंदगी के समूचे भंवर के बीच, हमें एक मर्तबा फिर खुद को यह कहने और याद दिलाने की जरुरत है कि अपने किनारे हम खुद हैं। और किनारा स्वयं गहरे तक तैर कर, डूब कर ही हासिल होता है।

कौनसा रंग पहनूं? किस रास्ते से जाऊं? कैसे काम को करना मुझे खुशी देगा? स्त्री के मन में उमड़ते – उपजते सवालों के लम्बे सिलसिले और जवाब के लिए कभी पिता, कभी भाई तो कभी पति या पुरुष मित्र की ओर देखना। इस देखने में किसी दिन एक आस बंधी रही, तो किसी सांझ एक विवशता। दूसरों की नजरों से खुद को देखते – देखते वह यह भूल ही गई कि उसकी अपनी भी नजर है, दृष्टिकोण है, इच्छाएं और इस सब के इतर, एक मकसद है!

परिवार बेटियों को बंधनों के बीच ही पालते रहे हैं। उन्हें मां और बाबा ने प्रेम की गठरियां दीं, लेकिन साहस का एक टुकड़ा भी नहीं मिला। फिर विवाह हुआ तो पति स्वामी हो गया। उसी की पिछलग्गू बन, अधिकतर स्त्रियां अपनी जीवन – रेखा रचती रहीं। अनुगमन में ही वे स्वयं की सम्पूर्णता समझती रहीं। इस समय का बड़ा सवाल यह है कि कब तक, वे यूं ही जीती रहेंगी? कब वे स्वयं को तलाशेगीं?किस दिन उनमें इतना साहस हो सकेगा कि वे आइने में खुद की सूरत देख सकें, सिर्फ खुद की?

‘क्वीन’ की मध्यमवर्गीय परिवार की कस्बाई लड़की ‘रानी’ हो या ‘हाइवे’ की संभ्रात परिवार में पली – बढ़ी ‘वीरा’ हो, वे समूचे बंधनों से दूर, स्वयं को पहचानने की यात्रा पर निकल चुकी हैं। वे स्वयं को पा चुकी हैं। और तब उन्हें एहसास हुआ है कि वे अब तक किसी और को खुद पर ओढ़कर झूठ जी रही थीं। पहली मर्तबा वे स्वयं के सच से टकराई हैं और इस टकराहट ने उन्हें नई पहचान दी है।

स्वतन्त्र होने का अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियां अलग – थलग हो जाएं। महत्वपूर्ण यह है कि वे जीवन में भरपूर प्रेम करें, विवाह करें, परिवार में रहें, लेकिन खुद को नहीं भूलें। स्वयं की आकांक्षाओं को अन्त में नहीं रखें। अपनी इच्छाओं को दूसरों की अनुमति मिलने तक प्रतीक्षा नहीं करवाएं। सफेद घोड़े के राजकुमार के इतर स्वयं के स्वप्न भी संजोए। किसी का घर बसाने – सजाने के इर्द – गिर्द अपने लिए भी एक कोना तलाशें। आज, स्त्री को चाहिए कि वह अपने भीतर एक यात्रा पर निकले और खुद को खोजे। भय की आंखों में घूरे, चिंताओं को चिता पर जला दे और बाध्यताओं को पोटली बनाकर, किसी दूर समन्दर में फेंक आए। तब ही वह पा सकेगी सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने का भाव और जीवन का वास्तविक सरोकार।

मानसिकता में परिवर्तन होने की जरुरत है। समाज के साथ, महिलाओं को भी व्यक्तिगत तौर पर अपनी सोच को सशक्त करना होगा। उन्हें यह समझने की दरकार है कि वे जीवन को किसी और के बूते निर्वाह करते रहने के बजाय, अपने पैरों पर मजबूती से खड़ी हों। आर्थिक स्वावलम्बन आजादी की ओर, पहला कदम है। इसके इतर, अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का साहस रखना होगा।मैं अपने परिवार की पहली बेटी हूं, जो मीडिया सरीखे अपरम्परागत क्षेत्र में सक्रिय हूं। मैं जीवन के सारे फैसले अपनी मानसिकता के अनुसार लेती हूं, समाज की बाध्यताओं के अनुरूप नहीं। हालांकि परिवार का साथ बना रहा है, लेकिन स्वयं भी सशक्त होकर अपना पक्ष रखना होता है, अन्यथा आपकी बात पर गौर नहीं किया जाएगा।

रीना खान, टीवी पत्रकार।

 

निश्चित ही समाज में परिवर्तन हो रहे हैं। हालांकि यह परिवर्तन रातोरात नहीं हो सकते, चूंकि मानसिकता में बदलाव एक लम्बी प्रक्रिया है। निजी तौर पर मैं महसूस करती हूं कि पिछले 20 बरसों में महिलाओं की स्थिति और मानसिकता के संदर्भ में बदलाव हुए हैं। मैं स्वयं 20 बरस की उम्र में जो सोचती थी, उसमें बहुत बदलाव आया है। समय हमारी मानसिकता और दृष्टिकोण को बहुत परिपक्व बनाता जाता है।एक व्यक्ति के तौर पर, हर स्त्री को चाहिए कि वह घर – परिवार के इतर, स्वयं की तलाश करे। अपने भीतर एक यात्रा पर निकले और तय करे कि क्या करने में स्वयं को सच्चा सुख मिलता है। खाने – कमाने के इतर भी जीवन का एक उद्देश्य है। कुछ स्त्रियों को मैं देखती हूं कि वे रोजमर्रा के कामों के अतिरिक्त, रचनात्मक कार्यों में खुद को तलाशती हैं। यह जरूरी है कि हम जीवन की ऊपरी परतों के नीचे दबे, वास्तविक अर्थ को भी तलाशें और नए प्रयोग करते रहें। हम वह करने का साहस रखें, जो हमें सुख दे।

पल्लवी त्रिवेदी, एडिशनल एस पी, भोपाल।

 

यह कोरा सच है कि स्त्रियां पुरुषों से, किसी भी प्रकार कमतर नहीं होती। बल्कि वे अधिक रचनात्मक होती हैं। वे यदि अपने दिल की सुनें और उसी के अनुसार अपने क्षेत्र में डटी रहें, तो उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज भी सामाजिक बाध्यताएं बनी हुईं हैं और महिलाओं को बांध कर रखने की भरसक कोशिशें की जाती हैं। वे कुछ भी करें, उन्हें परिवार और समाज के प्रश्नों का सामना करना पड़ता है।मैने जीवन में, हमेशा अपने मन को सुना है। पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए मैं वह करती हूं, जो मुझे अच्छा लगता है। हालांकि मेरा यह भी मानना है कि जीवन में अनुशासन बना रहना भी जरूरी है। यह आपको गलत करने से रोकता है। आप चाहे बिल्कुल किसी नए क्षेत्र में खुद को आजमाएं, चाहे आपको चारों ओर से नकारात्मक बातें सुनने को मिलें, लेकिन आप अपने काम में जुटी रहें। यही राह हमें खुद से मिलवाएगी।

इरा टाक, चित्रकार व लेखिका।

 

शहरों में बदलाव दिखते हैं, लेकिन इसके परे स्थितियां अधिक नहीं बदली हैं। आज भी महिलाएं स्वयं निर्णय लेने में सक्षम और सहज महसूस नहीं करतीं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद उनके जीवन की बागडोर किसी और के हाथों में बनी रहती है। यह कमोबेश विचित्र स्थिति है और निस्संदेह इसे बदलने की जरुरत है।

विपिन चौधरी, सामाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ लेखिका।

अमृता प्रीतम की आत्मकथा – ‘रसीदी टिकट’

“मेरी सारी रचनाएं, क्या कविता, क्या कहानी और क्या उपन्यास, मैं जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की तरह हैं। मेरी दुनिया की हकीकत ने मेरे मन के सपने से इश्क किया और उनके वर्जित मेल से यह सब रचनाएं पैदा हुईं। जानती हूं, एक नाजायज बच्चे की किस्मत इसकी किस्मत है और इसे सारी उम्र अपने साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगतने हैं।

मन का सपना क्या था, इसकी व्याख्या में जाने की आवश्यकता नहीं है। यह कम्बख्त बहुत हसीन होगा, निजी जिन्दगी से लेकर कुल आलम की बेहतरी तक की बातें करता होगा, तब भी हकीकत अपनी औकात को भूलकर उससे इश्क कर बैठी और उससे जो रचनाएं पैदा हुईं, हमेशा कुछ कागजों में लावारिस भटकती रहीं…”

यह है अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ का एक अंश, जो उनके शब्दों में उनकी समूची जीवनी का सार है। वे जानती थीं कि उनके मुक्त व स्वतन्त्र व्यक्तित्व को पुरातनपंथी समाज पचा नहीं सकेगा, लेकिन फिर भी उन्होने स्वयं को बांधना स्वीकार नहीं किया। एक पूरा विद्रोही जीवन जिया और स्याही में कलम डुबोकर बदलाव की इबारत रची। शताब्दियों तक उनका जीवन दूसरों, विशेष कर स्त्रियों को आजादी की उड़ान भरने की प्रेरणा देता रहेगा।

हम प्रति क्षण दो समानान्तर जीवन जी रहे होते हैं – एक, जो हमारे बाहर दुनियावी कोलाहल बनकर तैर रहा है, दूसरा – जो हमारे भीतर कुलबुला रहा होता है। जब इन दोनों जीवनों के मध्य असमंजस की लहरें उफान लेने लगती हैं, तो सहन करने की एक निश्चित सीमा के उपरान्त विद्रोह का अंकुर फूटता है। इस अंकुर से फूटता है जीवन का वास्तविक अर्थ और स्वयं के अस्तित्व का कारण। अमृता प्रीतम भी जीवन के झंझावतों से जूझती रहीं। बचपन में सगाई और किशोरावस्था में विवाह के उपरान्त दो बच्चों की मां बनीं, लेकिन पारिवारिक बंधन भी उन्हें अधिक समय तक रोक नहीं सके। उन्होने निजी समस्याओं को सिरे पर रख, कालजयी साहित्य रचा। प्रेम भी किया और साहसी हो स्वीकार भी किया।

अमृता के व्यक्तित्व में जो साहस था, सामाजिक वर्जनाओं के विरुद्ध जो विद्रोही भावना थी, वह बचपन के दिनों से ही उपजने लगी थीं। जैसा वे स्वयं लिखती हैं – “सबसे पहला विद्रोह मैने नानी के राज में किया था। देखा करती थी कि रसोई की एक परछत्ती पर तीन गिलास, अन्य बर्तनों से हटाए हुए, सदा एक कोने में पड़े रहते थे। ये गिलास सिर्फ तब परछत्ती से उतारे जाते थे, जब पिताजी के मुस्लिम दोस्त आते थे और उन्हें चाय या लस्सी पिलानी होती थी और उसके बाद मांज – धोकर फिर वहीं रख दिए जाते थे।”

उम्र के जिस पड़ाव पर दूसरी लड़कियां गुड़ियाएं सजाने अथवा घर सम्भालने के गुर सीख रही होती थीं, अमृता के मन में कई प्रश्न उबलने लगे थे। जातियता और धर्म के नाम पर बने सामाजिक खांचे उन्हें उद्वेलित करने लगे थे। ग्यारह बरस की उम्र में अमृता ने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा कर दिया। उन पर धार्मिक पिता का दबाव था, समाज की अपेक्षाएं थीं, लेकिन वे इन सबसे इतर हर रात, सामाजिक किलों से आजादी के सपने देखती। ऐसे ही एक सपने के बारे में वे लिखती हैं –

“एक सपना था कि एक बहुत बड़ा किला है और लोग मुझे उसमें बंद कर देते हैं। बाहर पहरा होता है। भीतर कोई दरवाजा नहीं मिलता। मैं किले की दीवारो को उंगलियों से टटोलती रहती हूं, पर पत्थर की दीवारों का कोई हिस्सा भी नहीं पिघलता। सारा किला टटोल – टटोल कर जब कोई दरवाजा नहीं मिलता, तो मैं सारा जोर लगाकर उड़ने की कोशिश करने लगती हूं।

मेरी बांहों का इतना जोर लगता है कि मेरी सांस चढ़ जाती है। फिर मैं देखती हूं कि मेरे पैर धरती से ऊपर उठने लगते हैं। मैं ऊपर होती जाती हूं, और ऊपर, और फिर किले की दीवार से भी ऊपर हो जाती हूं। सामने आसमान आ जाता है। ऊपर से मैं नीचे निगाह डालती हूं। किले का पहरा देने वाले घबराए हुए हैं, गुस्से में बांहें फैलाए हुए, पर मुझ तक किसी का हाथ नहीं पहुंचता।”

अमृता ने धार्मिक और जातीय बंधनों के विरोध में कई रचनाएं गढ़ीं, जिसके कारण तत्कालीन सिख समाज उनकी मुखालफत करने लगा। देश के विभाजन के उपरान्त लिखी गई एक कविता ने अमृता को प्रशंसा भी दिलाई, साथ ही कुछ समुदायों ने उन्हें प्रश्नों के घेरे में भी खड़ा कर दिया।

“आज वारिस शाह से कहती हूं, अपनी कब्र में से बोलो

और इश्क की किताब का कोई नया पृष्ठ खोलो

ऐ दर्दमंदों के दोस्त! अपने पंजाब को देखो

वन लाशों से अटे पड़े हैं, चिनाव लहू से भर गया है।”

 

अमृता ने कई सामाजिक मंचों और सम्मेलनों में खुलकर एक धर्म मुक्त समाज बनाने जैसी बातें कहीं। तथाकथित धार्मिक मठाधीशों की ओर से उनका विरोध होना स्वाभाविक था। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि भीरू समाज को ऐसे साहसी व विद्रोही स्वर कभी रास नहीं आए। उन्हें चुप करने की कवायदें जोर मारती रहीं। लेकिन क्या उन्हें चुप किया जा सकता है? नहीं, कभी नहीं।

अमृता ने विश्व के कई देशों और सभ्यताओं के साहित्यकारों के बीच, अपनी विद्रोही रचनाएं पढ़ी और प्रशंसा बटोरी। उन्होने दूसरे विद्रोही कवियों – लेखकों को भी भरपूर सुना और समझा। विश्व का कोई भी कोना ऐसा नहीं है, जहां कोई सामाजिक भेद नहीं हो। हर हिस्से की अपनी समस्या है और ऐसे में ‘ककनूसी’ नस्ल के साहित्यकार कागजों पर विद्रोह रचते रहे हैं। कलम से युद्ध लड़ते रहे। अमृता लिखती हैं – “मनुष्यों की जिस नस्ल ने हर विनाश में से गुजर सकने की अपनी शक्ति को पहचाना,अपना नाम जल मरने वाले और अपनी राख में से फिर पैदा हो उठने वाले ककनूस से जोड़ दिया।”

प्रेम प्राथमिक क्रांति है। स्वतन्त्र व्यक्ति ही सच्चा प्रेम कर सकता है। साहिर से उनका प्रेम खामोशियों के इर्द – गिर्द पनपता रहा। जुबां ने मशक्कत नहीं की, लेकिन मन सब कुछ जानता था। साहिर के बारे में, अमृता कुछ यूं लिखती हैं –

“वह चुपचाप सिर्फ सिगरेट पीता रहता था, कोई आधी सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नई सिगरेट सुलगा लेता था और उसके जाने के बाद केवल सिगरेटों के बड़े – बड़े टुकड़े कमरे में रह जाते थे।

कभी…एक बार उसके हाथ को छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी। उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेटों के टुकड़ों को सम्भाल कर अलमारी में रख लेती थी, और फिर एक – एक टुकड़े को अकेले बैठकर जलाती थी। और जब अंगुलियों के बीच पकड़ती थी, तो लगता था, जैसे उसका हाथ छू रही हूं।”

जिससे एक मर्तबा प्रेम हो जाए, फिर जीवन भर नहीं छूटता। अतीत की स्मृतियों से वह कभी रिक्त नहीं होता। प्रेम की मृत्यु हमारी आंशिक मृत्यु है। हर बार प्रेम के मरने पर हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए मर जाता है। जब साहिर की मृत्यु हुई, तो अमृता ने लिखा – “सोच रही हूं, हवा कोई भी फासला तय कर सकती है, वह आगे भी शहरों का फासला तय किया करती थी। अब इस दुनिया और उस दुनिया का फासला भी जरूर तय कर लेगी…”

अमृता प्रेम में रहीं और मुक्त भी रहीं। सच्चा प्रेम कभी बांधता नहीं है। वे प्रेम में और स्वतन्त्र होती गईं। जब उन्हें इमरोज से इश्क हुआ, तो कई बरस उनके साथ रही। जीवन की धूप – छांव में दोनों एक दूसरे का हाथ थामे रहे। एक दूसरे पर कुछ थोपे बिना, सदा साथ बने रहे।

रसीदी टिकट का हर पन्ना बयां करता है कि कैसे अमृता ने एक स्त्री होते हुए, बन्धनों के बीच, बन्धनों का सशक्त विरोध किया। अन्याय और असमानताओं के खिलाफ लिखती – बोलती रहीं।एक स्त्री, एक मां, एक प्रेमिका और एक लेखिका होने के बीच उलझतीं रही और निकलने को राह भी बनाती रहीं। उनके लिए, जीवन यथार्थ से यथार्थ तक पहुंचने का सफर रहा। यथार्थ को पाने का हासिल, आखिर कितनों का मकसद होता है और कितने उसे छू भर भी पाते हैं? अमृता जैसी साहसी लेखिका कागज पर काले अक्षरों से सुनहरा इतिहास लिख जाती हैं और हम पन्ने पलट – पलट कर उनकी छाया का महज अनुमान लगा सकते हैं। एक कभी न मिटने वाली छाया। तमाम उम्र वे कंकड़ों पर चलीं, लेकिन लौटी नहीं। अपने सपनों को जिया। पूरी बांहों का जोर लगा कर, सचमुच किले की नहीं पिघलने वाली दीवारों से बहुत ऊपर उठ गईं।  धरती से ऊपर उठ, आसमां में उड़ान भरने लगी। किले पर पहरा देने वाले उन्हें यूं उड़ता देख घबराए, गुस्से में बांहें फैलाए रहे, लेकिन फिर कोई हाथ उन तक पहुंच नहीं सकता था।

 

मैं खिड़कियां तोड़कर ही छलांग लगाउंगी




संसार के समस्त मुख्य पृष्ठों पर 
तुम उंडेलते रहे अपनी जीवन गाथाएं
और मेरे लिए छोड़े गए सिर्फ हाशिए
जहां, हर बार मैने लघुत्तम रूप में उतारी अपनी आत्मकथा

एक आत्मकथा
जिसमें उदासियां इतने भीतर तक पसरी थीं कि वे सुन्दर हो गई थीं 
जहां पीड़ाएं हो गई थीं इतना सच कि उनसे छूटने की कोई शीघ्रता न बची थी
और अन्तत: जिसे घोषित किया गया
एक ‘नीरस औरत की नीरस कहानी’

जब तुम ने तय किए सफलता के समूचे कठोर रास्ते
तुम्हारे पद चिह्नों के ठीक पीछे थे मेरे पैरों के निशां
देखो, वे इतिहास के किसी भी भाग में कभी दर्ज नहीं हुए

मुझे रोज पिलाई गई है एक कारगर पिछलग्गू बनने की घुट्टी
बचपन के दिनों से मैने रचे हैं मिट्टी के घर और सजाई हैं गुड़ियाएं
एक पूरा जीवन रीत गया है, मुझे यह जानने भर में
कि तुम्हारे अस्तित्व के इर्द – गिर्द अपनी परछाई तलाशने के इतर
मेरे जीवन का भी कोई स्वतन्त्र उद्देश्य है

तुम कभी नहीं रहे मेरे प्रतिभागी, न हो सकोगे
चूंकि हमारी दौड़ ही बहुत अलग – अलग स्थानों से शुरू हुई है
जानती हूं, दरवाजे नहीं हैं मेरी नियति में 
मैं खिड़कियां तोड़कर ही छलांग लगाउंगी
जीवन के मैदान में।