क्वीन्स रोड

  डेली न्यूज के बुधवार परिशिष्ट ‘खुशबू’ में प्रकाशित (19 मार्च 2014)

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‘तुम ही तो हो किनारे’…‘क्वीन’ फिल्म के एक गाने की यह पंक्ति जब कानों में घुलती है, तो महसूस होता है कि यह हमारे ही लिए है। हम सब स्त्रियों के लिए। हम जीवन के अमूमन हर मोड़ पर किन्ही दूसरी अंगुलियों की पतवार थाम, अपना किनारा तलाशती हैं। जिंदगी के समूचे भंवर के बीच, हमें एक मर्तबा फिर खुद को यह कहने और याद दिलाने की जरुरत है कि अपने किनारे हम खुद हैं। और किनारा स्वयं गहरे तक तैर कर, डूब कर ही हासिल होता है।

कौनसा रंग पहनूं? किस रास्ते से जाऊं? कैसे काम को करना मुझे खुशी देगा? स्त्री के मन में उमड़ते – उपजते सवालों के लम्बे सिलसिले और जवाब के लिए कभी पिता, कभी भाई तो कभी पति या पुरुष मित्र की ओर देखना। इस देखने में किसी दिन एक आस बंधी रही, तो किसी सांझ एक विवशता। दूसरों की नजरों से खुद को देखते – देखते वह यह भूल ही गई कि उसकी अपनी भी नजर है, दृष्टिकोण है, इच्छाएं और इस सब के इतर, एक मकसद है!

परिवार बेटियों को बंधनों के बीच ही पालते रहे हैं। उन्हें मां और बाबा ने प्रेम की गठरियां दीं, लेकिन साहस का एक टुकड़ा भी नहीं मिला। फिर विवाह हुआ तो पति स्वामी हो गया। उसी की पिछलग्गू बन, अधिकतर स्त्रियां अपनी जीवन – रेखा रचती रहीं। अनुगमन में ही वे स्वयं की सम्पूर्णता समझती रहीं। इस समय का बड़ा सवाल यह है कि कब तक, वे यूं ही जीती रहेंगी? कब वे स्वयं को तलाशेगीं?किस दिन उनमें इतना साहस हो सकेगा कि वे आइने में खुद की सूरत देख सकें, सिर्फ खुद की?

‘क्वीन’ की मध्यमवर्गीय परिवार की कस्बाई लड़की ‘रानी’ हो या ‘हाइवे’ की संभ्रात परिवार में पली – बढ़ी ‘वीरा’ हो, वे समूचे बंधनों से दूर, स्वयं को पहचानने की यात्रा पर निकल चुकी हैं। वे स्वयं को पा चुकी हैं। और तब उन्हें एहसास हुआ है कि वे अब तक किसी और को खुद पर ओढ़कर झूठ जी रही थीं। पहली मर्तबा वे स्वयं के सच से टकराई हैं और इस टकराहट ने उन्हें नई पहचान दी है।

स्वतन्त्र होने का अर्थ यह नहीं है कि स्त्रियां अलग – थलग हो जाएं। महत्वपूर्ण यह है कि वे जीवन में भरपूर प्रेम करें, विवाह करें, परिवार में रहें, लेकिन खुद को नहीं भूलें। स्वयं की आकांक्षाओं को अन्त में नहीं रखें। अपनी इच्छाओं को दूसरों की अनुमति मिलने तक प्रतीक्षा नहीं करवाएं। सफेद घोड़े के राजकुमार के इतर स्वयं के स्वप्न भी संजोए। किसी का घर बसाने – सजाने के इर्द – गिर्द अपने लिए भी एक कोना तलाशें। आज, स्त्री को चाहिए कि वह अपने भीतर एक यात्रा पर निकले और खुद को खोजे। भय की आंखों में घूरे, चिंताओं को चिता पर जला दे और बाध्यताओं को पोटली बनाकर, किसी दूर समन्दर में फेंक आए। तब ही वह पा सकेगी सच्चे अर्थों में स्वतन्त्र होने का भाव और जीवन का वास्तविक सरोकार।

मानसिकता में परिवर्तन होने की जरुरत है। समाज के साथ, महिलाओं को भी व्यक्तिगत तौर पर अपनी सोच को सशक्त करना होगा। उन्हें यह समझने की दरकार है कि वे जीवन को किसी और के बूते निर्वाह करते रहने के बजाय, अपने पैरों पर मजबूती से खड़ी हों। आर्थिक स्वावलम्बन आजादी की ओर, पहला कदम है। इसके इतर, अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का साहस रखना होगा।मैं अपने परिवार की पहली बेटी हूं, जो मीडिया सरीखे अपरम्परागत क्षेत्र में सक्रिय हूं। मैं जीवन के सारे फैसले अपनी मानसिकता के अनुसार लेती हूं, समाज की बाध्यताओं के अनुरूप नहीं। हालांकि परिवार का साथ बना रहा है, लेकिन स्वयं भी सशक्त होकर अपना पक्ष रखना होता है, अन्यथा आपकी बात पर गौर नहीं किया जाएगा।

रीना खान, टीवी पत्रकार।

 

निश्चित ही समाज में परिवर्तन हो रहे हैं। हालांकि यह परिवर्तन रातोरात नहीं हो सकते, चूंकि मानसिकता में बदलाव एक लम्बी प्रक्रिया है। निजी तौर पर मैं महसूस करती हूं कि पिछले 20 बरसों में महिलाओं की स्थिति और मानसिकता के संदर्भ में बदलाव हुए हैं। मैं स्वयं 20 बरस की उम्र में जो सोचती थी, उसमें बहुत बदलाव आया है। समय हमारी मानसिकता और दृष्टिकोण को बहुत परिपक्व बनाता जाता है।एक व्यक्ति के तौर पर, हर स्त्री को चाहिए कि वह घर – परिवार के इतर, स्वयं की तलाश करे। अपने भीतर एक यात्रा पर निकले और तय करे कि क्या करने में स्वयं को सच्चा सुख मिलता है। खाने – कमाने के इतर भी जीवन का एक उद्देश्य है। कुछ स्त्रियों को मैं देखती हूं कि वे रोजमर्रा के कामों के अतिरिक्त, रचनात्मक कार्यों में खुद को तलाशती हैं। यह जरूरी है कि हम जीवन की ऊपरी परतों के नीचे दबे, वास्तविक अर्थ को भी तलाशें और नए प्रयोग करते रहें। हम वह करने का साहस रखें, जो हमें सुख दे।

पल्लवी त्रिवेदी, एडिशनल एस पी, भोपाल।

 

यह कोरा सच है कि स्त्रियां पुरुषों से, किसी भी प्रकार कमतर नहीं होती। बल्कि वे अधिक रचनात्मक होती हैं। वे यदि अपने दिल की सुनें और उसी के अनुसार अपने क्षेत्र में डटी रहें, तो उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज भी सामाजिक बाध्यताएं बनी हुईं हैं और महिलाओं को बांध कर रखने की भरसक कोशिशें की जाती हैं। वे कुछ भी करें, उन्हें परिवार और समाज के प्रश्नों का सामना करना पड़ता है।मैने जीवन में, हमेशा अपने मन को सुना है। पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए मैं वह करती हूं, जो मुझे अच्छा लगता है। हालांकि मेरा यह भी मानना है कि जीवन में अनुशासन बना रहना भी जरूरी है। यह आपको गलत करने से रोकता है। आप चाहे बिल्कुल किसी नए क्षेत्र में खुद को आजमाएं, चाहे आपको चारों ओर से नकारात्मक बातें सुनने को मिलें, लेकिन आप अपने काम में जुटी रहें। यही राह हमें खुद से मिलवाएगी।

इरा टाक, चित्रकार व लेखिका।

 

शहरों में बदलाव दिखते हैं, लेकिन इसके परे स्थितियां अधिक नहीं बदली हैं। आज भी महिलाएं स्वयं निर्णय लेने में सक्षम और सहज महसूस नहीं करतीं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद उनके जीवन की बागडोर किसी और के हाथों में बनी रहती है। यह कमोबेश विचित्र स्थिति है और निस्संदेह इसे बदलने की जरुरत है।

विपिन चौधरी, सामाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ लेखिका।

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