कविताओं का अकेलापन

'कविताएं' जानती रही हैं
दुख में मेरे अस्तित्व की सम्पूर्णता
वे मेरे एकाकीपन को भंग नहीं करतीं
बस, मुझे स्पर्श करती हैं
और विदा हो जाती हैं

'कविताएं' जानती हैं मुझे
जैसे मैं पहचानती हूं उन्हें
वे भांप लेती हैं मेरी सुन्दर उदासी
और मैं भी समझ पाती हूं
इस खबरनवीस दौर में
कविताओं का अकेलापन!
Advertisements

स्त्री

जब किसी खाली दुपहरी में उगी
तुम्हारे भीतर विद्रोह की सूखी ललक
जागा खुद के खोखला होने का मुट्ठी भर एहसास
तुम ने सब घर वालों के मैले कपड़ों 
और झूठे बर्तनों में उसे तत्काल धो डाला

क्षणिकाएं


घर - 
जब भी लिखा या बोला गया ‘घर’ शब्द 
एक दृश्य मेरी आंखों के कोरों पर आकर ठहरा रहा
बरामदे में बैठे अखबार पढ़ते पिता और रसोई में चाय बनाती मां
मैने सदा चाहा कि कम से कम एक सुबह के लिए यह दृश्य उलट - पलट जाए
चाय पत्ती उबालें पिता और अखबार की सुर्खियां पढ़ सुनाए मां।

हाशिए - 
मुख्य पन्नों पर वीर रस से भरी
तुम्हारी आत्म कथाएं लिखी जाने के उपरान्त
महज हाशिए बचे रह गए मेरे हिस्से में
जहां मैं छोटी छोटी कहानियों और आसान पंक्तियों में
समेटूंगी अपने तमाम दुख और संघर्ष।

दुख - 
सुख हमेशा रहता है 
मुझ से छिटक जाने की जल्दी में 
दुख लिपटा रहता है 
जाने की हड़बड़ी में नहीं होता वह
मैं दुख को सुख की तरह चाहना सीख रही हूं।

शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती

तुम उपस्थित हो 
मेरे ठीक सामने
देख पा रही हूं तुम्हारे होठों का हिलना
शब्द कानों तक नहीं पहुंच रहे

मेरी गर्दन पर आकर बैठ गई है
अकेलेपन की महसूसियत
जो अब भीतर उतरती जाती है
वह मेरे साथ अधिक है
तुम से भी अधिक 

दुख के लम्बे क्षणों के अन्तराल में
वह ठिठक कर आता रहा है मेरे समीप
और अब मेरे निकट यूं रहना
उसका स्वभाव हो चला है
एक बुरा - सा स्वभाव

मैं देख सकती हूं 
तुम्हारे चेहरे की परिचित बनावट
शक्ल के इतर तुम्हे पहचान नहीं पाती 
हम एक अजीब समय खण्ड में आ पहुचे हैं
जहां एक दूसरे को पहचानना भूलता जाता है
बीच के किसी रिक्त बिन्दु पर जगह पाकर
पसर गया है अकेलापन
जरा देर के लिए गौर से सुनो
तुम उसे सुन सकते हो मेरे मौन में!

मैं खिड़कियां तोड़कर ही छलांग लगाउंगी




संसार के समस्त मुख्य पृष्ठों पर 
तुम उंडेलते रहे अपनी जीवन गाथाएं
और मेरे लिए छोड़े गए सिर्फ हाशिए
जहां, हर बार मैने लघुत्तम रूप में उतारी अपनी आत्मकथा

एक आत्मकथा
जिसमें उदासियां इतने भीतर तक पसरी थीं कि वे सुन्दर हो गई थीं 
जहां पीड़ाएं हो गई थीं इतना सच कि उनसे छूटने की कोई शीघ्रता न बची थी
और अन्तत: जिसे घोषित किया गया
एक ‘नीरस औरत की नीरस कहानी’

जब तुम ने तय किए सफलता के समूचे कठोर रास्ते
तुम्हारे पद चिह्नों के ठीक पीछे थे मेरे पैरों के निशां
देखो, वे इतिहास के किसी भी भाग में कभी दर्ज नहीं हुए

मुझे रोज पिलाई गई है एक कारगर पिछलग्गू बनने की घुट्टी
बचपन के दिनों से मैने रचे हैं मिट्टी के घर और सजाई हैं गुड़ियाएं
एक पूरा जीवन रीत गया है, मुझे यह जानने भर में
कि तुम्हारे अस्तित्व के इर्द – गिर्द अपनी परछाई तलाशने के इतर
मेरे जीवन का भी कोई स्वतन्त्र उद्देश्य है

तुम कभी नहीं रहे मेरे प्रतिभागी, न हो सकोगे
चूंकि हमारी दौड़ ही बहुत अलग – अलग स्थानों से शुरू हुई है
जानती हूं, दरवाजे नहीं हैं मेरी नियति में 
मैं खिड़कियां तोड़कर ही छलांग लगाउंगी
जीवन के मैदान में।

बंधुआ जीवन या मुक्त मृत्यु

 

तुम ने मेरी आत्मा की हत्या की थी
(इस दौर में ‘आत्मा’ की बात करना किसी खतरे से खाली नहीं है)
मैं सिर्फ तुम्हारी देह का अन्त कर सकी हूं
फर्क सिर्फ इतना भर है
कि मेरी मृत्यु और तुम्हारा अपराध
विश्व के किसी भी न्यायालय में
नहीं हो सकेगा प्रमाणित

जब – जब तुम झांकोगे इतिहास की गर्द में
वह तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर कहेगा
हजारो मर्तबा मैने मांगी थी
तुम से और इस समूचे संसार से
अपने हिस्से की पूरी आजादी

तुम्हारी हत्या ही मेरे लिए अन्तिम मार्ग था
उन सुविधाओं से युक्त कैदगाह से मुक्त होने को

समय साक्षी है
कि हत्या के क्षणों में मेरे हाथ कांपे थे
और मैने भय को अपनी धमनियों में महसूस किया था

मेरे समक्ष दो ही विकल्प थे
बंधुआ जीवन या मुक्त मृत्यु
मैने ‘मुक्त मृत्यु’ को चुना।

आत्मघाती स्त्रियों की आत्माएं

IMG_0585


तुम ने हर मर्तबा
मुझे महसूस करने के उपरान्त
मेरे सौन्दर्य पर गढ़ी एक कविता

बढ़ता गया कविताओं का पुलिंदा

मै जीवन पर्यन्त कैद रही अपनी देह में
संसार की सारी स्त्रियों की तरह
प्रति क्षण सड़क, चौराहों और घरों में
उन्हें याद रखवाया गया
कि वे स्त्रियां हैं

उनमें कुछ दुस्साहसी स्त्रियां
समाज की उस सड़ांध भरी नाली से प्रतिशोध चाहती थीं
जिसमें बह गया उनका समूचा जीवन
उनकी रातें मचलती थीं कुछ हत्याएं करने को
और आखिर में उन्होने सामूहिक आत्महत्या की

सामाजिक बाध्यताओं और विवशताओं में
लिपटा रहा अस्तित्व

आखिर धैर्य भी कितना धैर्य रख पाता
शायद उन आत्मघाती स्त्रियों की आत्माओं ने
हम में फूंक डाला साहस
और आज हमारे नाखूनों में
उनकी त्वचा के रेशे हैं
जो हवस के साथ बढ़े थे हमारी ओर

तुम अगली बार जब लिखोगे एक कविता
वह निश्चित ही मेरे साहस पर होगी।

आइने के पीछे भी कोई आइना हो सकता है

यह एक विचित्र प्रकार का समय है
जिसने हमारी आंखों पर एक विशेष चश्मा चढ़ा रखा है
हर एक व्यक्ति अपने उसी चश्मे से देखता है दुनिया
और जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना

समूचा जीवन क्या है
एक अनन्त रहस्य के अतिरिक्त
हम अपनी आंखों की पुतलियों के
फैलने जितना भर ही देख और समझ पाते हैं जीवन
जबकि हमें यही भान होता है
कि हम जानते हैं

घरों की छतों पर चिपकी रहने वाली छिपकलियां
और कमरों में कूदते रहने वाले चूहे
शायद हम से अधिक और प्रथम अधिकारी हैं यहां रहने के
वे यहां तब से हैं, जब हमारे घर खाली जमीं थे
और यह भूला नहीं जाना चाहिए
कि हम ने उनके बिलों पर अपने कमरे खड़े किए हैं

मुमकिन है किसी रात जब आप सोए हों
चादर तानकर, तकिए में मुंह दबाए
चींटियों का कोई झुण्ड आपके घर की दीवारें खोखली कर दें
और आप यह जान पाएं
कि उन्होने आपके नहीं, बल्कि आपने उनके
जीवन में हस्तक्षेप किया है
और आप महज इसलिए सही नहीं हो जाते
क्यूंकि आप उनसे कहीं अधिक बड़े और ताकतवर हैं

अमूमन आइने में खुद को देखते हुए
हम यह नहीं जानते कि शायद
आइने के पीछे भी कोई आइना हो सकता है!

अपेक्षाओं के तन्तु



घर प्रेम दे सकते हैं
साहस नहीं
वह तो खुरदुरी सड़क ही सिखा सकती है

हर मर्तबा थाली में रखी गई
रोटियों के साथ
परोसे गए कुछ उलाहने
सब्जी की कटोरी के तले
पाए गए अपेक्षाओं के तन्तु

संवेदना हर बार मुझ तक लौटी
वेदना बन कर

मां का सुन्दर ललाट
देख ही जिया जा सकता था
भय के इस दौर में

एक बहुत लम्बे अरसे से
उसने भी सब के नाश्ते, कपड़े, इस्त्री, मंदिर
और बहुत कुछ इतना याद रखा
कि इन दिनों उसे कुछ याद नहीं रहता

क्या उस पीड़ा को
रुदन में समेटा जा सकता है
जिस दुपहर तुम्हारी मां
तुम्हे पहचान ही ना पाए
और कोई नहीं बचे
घर पर तुम्हारी प्रतीक्षा में
घड़ी देखते रहने को।

आंसू अच्छे हैं




तुम्हारी हंसी में भी शामिल रहता था इतना रुदन
जिसे यदि छांट कर अलग किया जाता
वह किसी के विशुद्ध रोने से अधिक मिलता
बरसों से अड़े हुए तुम्हारे पुरुषत्व ने
सरकाए रखा आंसुओं को आंखों से पहले
जमी हुई यह रुलाई का ढेर
आज झटक कर बता देता है
तुम्हारे रुंधे हुए गले का रहस्य

मन पर बढ़ने वाले बोझ के असहनीय होने की सीमा तक
उसे फिजूल हंसी में लपेटा जाता रहा
और फिर बीच – बीच में कुछ सुबहों में
नहाते समय तुम ने चबा लिए अपने सारे आंसू

क्या यूं रोने के उपरान्त नहीं दुखते तुम्हारे जबड़े

मेरी मुट्ठियों में दो अपने हाथ
जिससे मैं तुम्हे सिखा सकूं रोने की कला

यदि किसी साहसी सांझ में तुम झाड़ सको
पौरुष की ऐतिहासिक परिभाषा पर पड़ी मिथ्या गर्द
मैं भी निकल जाउंगी स्त्रियों के उस समूचे आवरण से बाहर
और तुम रो सकोगे अंतस का भार खत्म हो चुकने तक

और फिर यही होगा तुम्हारा अगला वाक्य
आंसू अच्छे हैं
वे तुम्हे बना जाते हैं हर बार
पहले से कुछ अधिक मनुष्य!