शोर तुम्हारे भीतर है

 

– ओह, कैसा अजीब शहर है न यह! अलसुबह ही शोर होने लगता है। देर रात तक भी गाड़ियों के आने – जाने की आवाजें आती रहीं। मैं तो सो ही नहीं सकी, मृदुल।

– मैं भी कहां सो पाया।

– झूठ न कहो, खर्राटे भर रहे थे तुम पूरी रात। कुछ तो गाड़ियों के शोर और कुछ तुम्हारे खर्राटों की आवाज ने बिल्कुल आंख नहीं लगने दी।

– मैं कहां खर्राटे लेता हूं, संध्या।

– तुम्हे क्या होश? तुम तो घोड़े बेचकर सो रहे होते हो। मैं कह रही हूं न, तुम्हारे खर्राटे तो इतने भयानक होते हैं कि मुर्दे को खड़ा कर दें।

– जब मुझसे इतनी ही परेशानी हो रही थी, तो दूसरे कमरे में सो जाती।

– वहां भी जाकर लेटी थी। वहां तो गाड़ियों की आवाजें और भी तेज आ रही थी। उस पर, गली के सारे कुत्तों को ना मालूम, रात को क्या हो जाता है? उतना भौंकते हैं कि पूछो मत…और ये घड़ी की टिक – टिक भी क्या कम सताती है। पंखा भी कितनी आवाज कर रहा है, कुछ दिनों से। किसी इलेक्ट्रिशियन को क्यों नहीं बुलाते?

– तुम जरा लंबी सांस भर कर सोने की कोशिश किया करो, संध्या। ये आवाजें मेरी नींद में खलल नहीं डालती। तुम इतना सोचती हो इन सब के बारे में…इसीलिए ये उलझाव तुम्हे सोने नहीं देते।

– अरे, तुम भी कैसी बात करते हो? सोने की कोशिश तो करती ही हूं न। लेकिन नींद पास ही नहीं फटकती, तो जबरन कैसे सोऊं?

– इस तरह सो नहीं सकोगी, तो बीमार पड़ जाओगी।

– लेकिन करूं क्या। कोई मेरी बेचैनी समझता ही नहीं। तुम भी नहीं।

– ऐसा मत कहो, संध्या। मैं समझता हूं, लेकिन इससे बाहर तो तुम्हे खुद ही निकलना होगा। मैं, बस तुम्हारी मदद कर सकता हूं।

– मृदुल, मेरी एक बात मानोगे?

– कहो तो

– देखो…क्या हम कुछ महीने कहीं दूर जा कर नहीं रह सकते?

– दूर कहां?

– कहीं भी। किसी पहाड़ के पास। आस – पास के किसी छोटे – मोटे स्कूल में पढ़ा लूंगी मैं। तुम भी कुछ काम ढूंढ लेना वहीं। यूं भी, वहां खर्च बहुत कम ही होगा। हम आसानी से अपना गुजारा तो कर ही लेंगे।

– ठीक है, पर क्या होगा वहां जाकर?

– मैं सो पाउंगी, शायद। वहां, ये गाड़ियों की आवाजें कानों में नहीं पड़ेंगी। ये कुत्ते नहीं भौकेंगे। सब शांत होगा चारों ओर। कितना सुकूं मिलेगा। चैन की नींद सो सकूंगी।

– और करेंगे क्या सारा दिन वहां?

– सबसे पहले एक झोपड़ी बनाएंगे। उसमें पानी का एक घड़ा होगा। कुछ बर्तन। एक बिस्तर। बिस्तर पर हरे रंग की चादर बिछाउंगी। फूलों वाली। हम उसी पर सोया करेंगे। फिर सुबह उठ कर मैं चाय बनाउंगी। तुम्हारे पास आउंगी। तुम्हारे माथे को चूम कर तुम्हे उठाउंगी। फिर तुम मेरी अंगुलियों पर अपना हाथ घुमाओगे।  हम दोनों साथ चाय पिएंगे। हालांकि, तब तक चाय ठण्डी हो चुकी होगी।

– ऐसा कुछ नहीं होगा। ये सब तुम्हारे खयाल हैं। वहां भी तुम्हे चैन नहीं मिले, शायद।

– ऐसा कैसे कह सकते हो तुम?

– क्यूंकि तुम अपनी आभासी दुनिया से बाहर नहीं आ रही।

– मतलब?

– मतलब, हम पिछले छह महीनों से एक पहाड़ के पास बनी झोपड़ी में ही रह रहे हैं। पिछले साल, दिसंबर में तुमने ठीक यही कहा था, जो अब कह रही हो। तुम्हारे एक बार कहने पर मैं, सब कुछ छोड़ कर तुम्हे लेकर यहां आ गया था। लेकिन कुछ नहीं बदला, बल्कि और बिगड़ गया है। तुम खो गई हो, खुद के बनाए एक संसार में। तुम्हारा बना संसार एक भ्रम से अधिक कुछ नहीं है। देखो, यहां एक – आधी गाड़ी दिखती है किसी दिन। और तुम्हे हमेशा शिकायत रहती है कि गाड़ियों के हॉर्न की आवाजें बहुत तेज हैं। यहां एक भी कुत्ता नहीं है पास, लेकिन तुम्हे उनके भौकने की आवाजें परेशान करती हैं। घड़ी नहीं टंगी है, किसी भी दीवार पर। लेकिन तुम, उसकी टिक – टिक सुनती हो। पंखा नहीं है यहां। लेकिन तुम उसकी आवाज ठीक करवाने के लिए इलेक्ट्रिशियन को बुलवाना चाहती हो।

– ये सब क्या कह रहे हो, मृदुल? ऐसा कैसे मुमकिन है, भला?

– यही सच है।

– नहीं..फिर, तो इसके मायने यह है कि मैं पागल हो चुकी हूं। मुझे कुछ याद ही नहीं।

– नहीं। पागल नहीं हुई हो तुम। बस, परेशान हो। एक अरसे से सो नहीं सकी हो। कुछ बेचैन हो। जाने क्या मचलता रहता है तुम्हारे भीतर। तुम ने अपनी एक दुनिया रच ली है और उसी को सच मानती हो। शहर की मसरूफियत और आपाधापी की वह दुनिया तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती। उससे दूर होने को हम यहां आए, लेकिन तुम उस दुनिया को यहां भी अपने साथ ही ले आई।

– अब क्या करूं मैं? (घबराते हुए)

– तुम्हे निकलना होगा, इससे बाहर।

– कैसे? तुम ही निकाल सकते हो, मुझे। (लगभग रोते हुए)

– नहीं, तुम्हे खुद ही निकलना होगा।

– क्यूं? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते अब? परेशान हो गए हो मुझसे और मेरी बीमारी से?

– नहीं…क्यूंकि मैं हूं ही नहीं।

– मतलब?

– मतलब, मैं जिंदा नहीं हूं। इस दुनिया को अलविदा कहे मुझे एक महीना बीत चुका है। और इस वक्त तुम काली मिट्टी से बनाए चौकोर फ्रेम में सजी मेरी तस्वीर से बात कर रही हो।

– नहीं, पागल मत करो मुझे।

– यही हुआ है।

– तो, तुम मुझ से बात कैसे कर रहे हो फिर?

– मैं बात नहीं कर रहा। मैं कुछ नही कह रहा। तुम सुन रही हो, जैसे दूसरी आवाजें सुनती हो।

– मैं तुम्हारा मरना कैसे भूल सकती हूं? तो, मैं यहां बिल्कुल अकेली हूं?

– नहीं, मैं तुम्हे कभी अकेला नही रहने दूंगा। मैं, तुम में धड़कता हूं हर वक्त। धड़कता रहूंगा। तुम, मुझे हमेशा सुन पाओगी। लेकिन, इस शोरगुल को सुनना बंद करना होगा तुम्हे। शोर तुम्हारे बाहर नही, भीतर है। उस शोर को चुप करना होगा। इन गाड़ियों की आवाजों को चुप करना होगा। इन कुत्तों के भौकने को रोकना होगा। सब कुछ खामोश कर दोगी, तो खुद को खोज पाओगी। खुद में लौट पाओगी। जी पाओगी। तुम्हे इससे बाहर आना होगा और ऐसा सिर्फ तुम ही कर सकोगी। सिर्फ तुम। अकेले।

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बुर्का पहन लो

 

रजिया ने टी वी देख रहे अपने शौहर से कहा – सुनिए, आज कहीं घूमने ले चलिए न! कितना सुहाना मौसम है! अभी बारिश होकर रुकी है।

ओहो, तुम भी। अब इस वक्त कहां चलेंगे?

कहीं भी, चलिए…बगल वाले बगीचे में ही ले चलिए न! घंटे भर में लौट आएंगे, फिर खाना लगा दूंगी।

ठीक है। चलो। तैयार हो जाओ।
मैं गुलाबी रंग वाली सलवार – कमीज पहन लूं।

हां, ठीक है। पहन लो और बुर्का जरूर पहन लेना। बगीचे में बहुत लोग होते हैं।

अगला दृश्य –

दोनों बगीचे में गीली घास पर बैठ गए। शौहर ने कहा – देखो रजिया, बारिश के बाद हवा वाकई कितनी अच्छी लग रही है न! मिट्टी से कैसी प्यारी महक आ रही है! बुर्के के भीतर से रजिया ने पलकें झुका कर हां में सिर हिलाया।

क्या शहर को हमारा गायब होना याद रहता!

कितनी भी गम्भीर बात कहती, तुम उसे अपने लतीफों में उड़ा देने में माहिर थे। ऐसा करने में जरा भी देर नहीं लगाते। आज जब हमें जिंदगी ने और जिंदगी को हम ने कुछ अधिक ही गम्भीर बना दिया है, तुम्हारी बे – सिर – पैर नुमा हरकतें रह रहकर याद आती हैं। लिखते वक्त इस कोरे सफेद कागज में महसूस होती रही तुम्हारी शरारती सांवली सूरत। चेहरे की एक – एक हरकत, जो तुम हंसाने के लिए किया करते थे।

तुम जानते थे, ये तो होना ही था एक न एक दिन। मैं भी जानती थी कि एक रोज तुम्हारे बारे में तुम्हे जरूर लिख रही होउंगी। मालूम तो तुम्हे भी था, लेकिन तुम जिंदगी को फिक्र के जालों में उलझाना नहीं चाहते थे। तुम किसी बात को लेकर चिंतित नहीं होते थे। कभी भी नहीं। कभी कोई भय नहीं होता था तुम पर। हम सब अपने अपने हिस्से के डर, चिंताओं और असुरक्षाओं में कैद थे, वहीं दूसरी ओर तुम थे। निरे आजाद। मुक्त। निश्चिन्त। सच कहूं, तो तुम्हारी इस बेफिक्री से बहुत रश्क होता था। मैं जानती थी कि हमारा प्रेम कहीं नहीं पहुंचेगा। हम कभी साथ नहीं हो पाएंगे। इस संशय ने मेरे मन का एक हिस्सा रिक्त कर दिया था। जब आप अंतस की गहनता तक प्रेम जी रहे हों और उसके कल को लेकर उतने ही आशंकित भी हों, तो एक अनकही रिक्तता का घेर लेना स्वाभाविक है। कई दिन ऐसे होते थे, जब कुछ महसूस होना जैसे बंद ही हो जाता था। कुछ रुंध जाता था मन के दरवाजे पर। ऐसे समय में कोई आपको प्रेम में चूम ले या अपशब्द कह डाले, आप कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। ना रुलाई फूटती है ना हंसी। खुद से एक भय का भाव उपजा दिया था उस समय ने। सबसे ज्यादा भय हमेशा खुद से ही होता है। सबसे ज्यादा शिकायतें और तकलीफें भी। हम सब भीतर बहुत सारा भय और संशय लेकर जीते हैं। जान बूझकर खुद को काम में इतना मसरूफ कर लेते हैं, ताकि यह भय हमारे सामने आकर खड़ा न हो जाए। हम उसे पीछे धकेलते रहते हैं। नीचे दबाते रहते हैं। जैसे मां अपने सारे भय रसोई में रख आती है या कपड़ों में धो डालती है। हम भी उन्हें सरकाते रहते हैं। कभी काम की आपाधापी में। कभी घर – गृहस्थी की चीजों में। कभी यहां – वहां खरीदारी या खाने – पीने जैसी बातों में। कभी अंधेरे में बड़े पर्दे पर सिनेमा देखने में। लेकिन इतना तो हम जानते हैं कि कितना भी सरका दिया जाए, किसी दिन तो फुर्सत होगी। तब वे भय इर्द – गिर्द फटकने लगेंगे। यदि लंबे जिए, तो बुढ़ापे में यह फुर्सत जरूर हमारे हिस्से में आएगी। उस समय करने को इतना काम नहीं होगा। शरीर असहाय हो चुकेगा। बुढ़ापे में वक्त इतना होता है कि हर घण्टे उठ – उठ कर घड़ी देखनी पड़ती है। तब वे भय हमारे अंतस के भीतरी कोनों से निकल कर बाहर आ जाएंगे। हमारे साथ बिस्तर पर सोएंगे। हमारे साथ उठेंगे। साथ रोएंगे।

हम साथ – साथ इतना घूमते थे कि शहर भर की सारी जगहें खत्म हो जाने को थीं। कोई नई जगह नहीं बची थी। शहर बहुत छोटा पड़ने लगा था। शहर से भी छोटे वे दिन थे, जब हम साथ होते थे। दिन को हमारा साथ रहना मंजूर नहीं होता था। वे बहुत जल्दी ढल कर शाम में तब्दील हो जाते थे और फिर हमें अलग होना होता था। रातें लम्बी होतीं और फिर सुबहें बहुत देर से उगतीं। सारा शहर आंखें फाड़े हमें घूरता। पलट कर हमें दोबारा देखता, जैसे पहचानने के कयास लगा रहा हो। शहर किसी शक्की जासूस जैसा था। हालांकि हम सारे कयासों और अनुमानों की पोटली हवा में उड़ाते और खूब घूमते। डर तो जैसे हम किसी पुड़िया में बांधकर किसी नाले में फेंक आए थे। नाले में फेंकना हमारी विवशता थी। शहर में कोई नदी नहीं थी। हम रोज सोचते थे, बल्कि दिल से चाहते थे कि शहर में कोई पानी वाली जगह होती, तो हम वहां बैठकर बातें करते। पानी वाली जगहों पर शायद अधिक प्रेम होता होगा। बहती लहरों की शीतलता प्रेमियों तक पहुंच जाती होगी।

तुम्हारी जिंदगी में मुझसे पहले भी कई लड़कियां रहीं थीं। पांच, छह, सात या इससे ज्यादा। मन का जुड़ाव तो दो से ही रहा, शायद। बाकी, तो यूं ही चलता रहा। यह बात मुझे ज्यादा उलझा देती थी कि महज शरीर पाने के लिए कैसे किसी से बंधा जा सकता है? मिल गया शरीर, फिर आगे क्या? शरीर का उन्माद कब तक रिश्ते को बचाए रख सकता है? शायद यही वजह रही होगी कि तुम एक के बाद एक रिश्ते बदलते रहे। मैं उन सारी स्त्रियों के बारे में जानना चाहती थी। जब तुम बहुत खुश होते, तो मैं तुम से पूर्व प्रेमिकाओं के बारे में जानने का प्रयास भी करती। मैं सब कुछ जानना चाहती थी। उनका चेहरा, उनकी आंखें, उनकी बातें और उनका प्रेम। तुम कुछ नहीं कहते थे। कैसे भी बात को गोल कर जाते। कोई दूसरी बात शुरू कर देते। शायद तुम उन लड़कियों की, जिनसे कभी तुम्हारा सम्बन्ध रहा था, बातें करते हुए असहज महसूस करते थे। कहीं ऐसा तो नहीं था कि तुम उन्हें भूल गए थे? मुझे बहुत अजीब खयाल आते थे, जब तुम मेरा हाथ पकड़ते थे। मेरा हाथ अपने हाथों में रखते हुए क्या तुम ने कभी अपनी पूर्व प्रेमिकाओं की अंगुलियां याद नहीं की होंगी? क्या कभी तुम ने मेरी आंखों में कोई और आंखें महसूस नहीं की होंगी? कई बार यह सोचना मेरे लिए असहनीय हो जाता कि जैसे तुम अभी मुझे गले लगा रहे थे, कभी उन्हें भी लगाया था? जैसे अभी मुझे चूमना चाहते थे, कभी उन्हें चूमना चाहते रहे होगे! और आज उनके बारे में कुछ नहीं कहते। एक प्रेमिका के तौर पर, यह मेरे लिए खुशी की बात थी, लेकिन मेरे भीतर का स्त्री मन विचलित हो जाता। दूसरी ओर यह भय भी उपजने लगता कि इस तरह तो एक दिन तुम मुझे भी भूल जाओगे। नई प्रेमिका के बालों में अपनी अंगुलियां फिराते हुए कोई सुन्दर कविता कहोगे। वह मेरे बारे में पूछेगी और तुम्हे कुछ याद नहीं आएगा। फिर तुम उसे भी यही कहोगे कि तुम उससे इतना प्रेम करते हो, कि पुरानी प्रेमिकाएं याद ही नहीं रहतीं। क्या तुम इतनी आसानी से भूल जाओगे हंसी में मुंद जाती मेरी बड़ी – बड़ी आंखें, मेरी लम्बी अंगुलियां, मेरा यूं ही देर तक बतियाते रहना?

इन दिनों अखबारों में कितनी ही ऐसी खबरें छपती हैं, जिनमें लिखा होता है कि लड़की को शादी का झांसा देकर फंसाए रखा गया। तब कई मर्तबा यह खयाल आता कि कहीं तुम भी ऐसा ही तो नहीं कर रहे। लेकिन अगले क्षण, वह खयाल चला भी जाता क्यूंकि मैं जानती थी कि तुम मुझ से बहुत प्रेम करते थे। लेकिन यह तो उन सारी लड़कियों को भी लगता होगा, जिन्हें लड़कों ने प्रेम में बांधकर ठगा होगा। तभी तो वे उनके सुनहरे वायदों के आगे सब भूल जाती होंगे। अक्ल पर पर्दे पड़ जाते होंगे। क्या तुम्हारा प्रेम भी ऐसा ही कोई छल था? यहां प्रेम था, विश्वास था, लेकिन हमेशा साथ रह पाने का वायदा नहीं था। तुम ऐसे किसी भी वायदे से बहुत दूर थे। मैं जब भी तुम से इस विषय में कहते – कहते रो पड़ती, तुम मजबूरियों में लिपटी हंसी हंस जाते। तुम्हारा यूं हंसना मेरे रोने से भी अधिक बदसूरत और दयनीय लगता था! तुम रोना चाहते थे, लेकिन खुद को रोक लेते थे।

इतना भय था, फिर भी तुम मुझ से छूटते ही नहीं थे। अधिक लिपटते जाते थे। घेरते जाते थे। मेरा जीवन एक गोल घेरे से अधिक कुछ नहीं था और इस घेरे में तुम ही खड़े होते थे। प्रेम जीवन को विस्तार देता है, लेकिन मेरा जीवन संकरा होता जा रहा था। तुम मुझ पर किसी पुरानी शराब जैसा असर कर रहे थे। नशा उतरता ही न था। रेत की तरह मैं अपनी मुट्ठी से फिसलती जाती थी। कई बार सोचती कि आज तुम से कह ही दूंगी कि अब खत्म करो यह सब। जब तुम जिंदगी भर मेरे साथ ही नहीं रह सकते, मुझे कोई कमिटमेंट नहीं दे सकते, तो इस सब का क्या अर्थ? लेकिन बात गले तक आकर अटक जाती। मुझे सब संवाद में बहुत प्रवीण मानते थे, लेकिन वहां सारी कुशलता धरी की धरी रह जाती। हर बार यही सोचकर लौट आती कि अगली बार जरूर कह दूंगी। वह अगली बार कभी नहीं आता था।

सड़क। सड़क से जाती कई गलियां। हर गली में सैकड़ों मकान। हर मकान में कितने ही लोग। मकानों से निकल कर सड़क पर आते सारे लोग। सड़कें सभी को मिला देती थीं। तारकोल की इन सड़कों पर इतनी गाड़ियों की भीड़ और लोगों का ऐसा हुजूम उमड़ता कि कई दुपहरियों में पसीना पोंछने के बाद सड़क किनारे लगी बैंच पर बैठ कर मुझे खुद को एहसास दिलाना होता कि मैं भी हूं। इतनी भीड़ को देख कर लगता कि यदि हम दोनों न भी रहें, तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा। हमारे चले जाने पर भी कुछ नहीं बदलेगा। तुम्हारे सामने होने पर यह सारा अनूठा विज्ञान मैं तुम पर उंडेलती। तुम भी प्रेम में सराबोर, सारा ज्ञान समेट लेते। तुम से कहीं बहुत – बहुत दूर चलने को कहती। इतना दूर, जहां किसी गाड़ी के किसी हॉर्न की आवाज हम तक ना पहुंचे। जहां सुबहें सिर्फ चिड़ियाओं की आवाजों से उगती हों। जहां नन्हे बच्चे भारी बस्ता लादे स्कूल नहीं जाते हों। जहां न किसी की घूरती आंखें हों, न हमारे चरित्र का आकलन करने वाले बुद्धिजीवी। जहां कोई हम से नहीं पूछता कि हमारा सम्बन्ध क्या है। जहां हम जावन किसी कैदगाह या प्रयोगशाला की तरह जीने को बाध्य नहीं होते। मैं किसी पहाड़ी स्कूल में पढ़ा लेती। तुम भी कहीं काम तलाश लेते। वहां जीने को ज्यादा सामान नहीं चाहिए। हम कम में भी आसानी से गुजारा कर लेते। सच्चे और खुश रह पाते। यह सब खयाल उपजते रहते और फिर हमारे मिलने का समय खत्म हो जाता। मैं घर लौट आती, जहां मां, पिता, भैया, दीदी, पड़ौसी, रिश्तेदार, समाज सब कुछ सिलसिलेवार याद आ जाता। तुम्हे भी घर परिवार, सपने, महत्वाकांक्षाएं, पैसा याद आ जाता। पहाड़ी पर सोचे गए उस जीवन की योजनाएं वहीं रह जाती, जहां हम ने उन्हें छोड़ दिया था।

हम में से अधिकतर को घर रहना इसीलिए रास आता रहा है, क्यूंकि वहां मां हैं। मां नहीं होतीं, तो घर तुरन्त कमरों और दीवारों में तब्दील हो जाता। मां के अतिरिक्त घर की चारदीवारी में सब कुछ बहुत व्यवहारिक था। नसीहतों का ढेर था – नौकरी तलाशो, पैसा बनाओ, गाड़ी खरीदो, बड़ा घर बनाओ, समाज में रुतबा बढ़ाओ, शादी करके घर बसाओ, बच्चे पैदा करो और फिर और पैसा बनाओ। अपने आस – पास हर शख्स की जिंदगी इतनी मिलती – जुलती थी कि मुझे समझ नहीं आता था कि वैज्ञानिक क्लोन्स और रोबोट्स क्यों बना रहे हैं! क्या हम पहले ही रोबोट और मशीन नहीं बन चुके हैं? अधिकांश लोग भीड़ में भेड़ों की तरह जी रहे थे। लेकिन जब वे दुकान पर कपड़े खरीदने जाते थे, तो कुछ अलग दिखाने को कहते। जो बिल्कुल हट कर हो और किसी और ने नहीं पहना हो। जहां, हमारे पास सब कुछ कमोबेश एक सा था, हम कपड़ों के रंगों और डिजाइनों से खुद को अलग महसूस कराने में नाहक मसरूफ थे। एक कतार में जीते – जीते सब के चेहरे भी इतने समान लगने लगे थे कि उन्हें अलग से पहचाना जाना मुश्किल था।

यदि यह सारी अनर्गल बातें र्मैं किसी से कहती, तो मुझ पर व्यवहारिक जीवन से जुड़ा सारा ज्ञान उलट दिया जाता। इससे बचने के लिए मैने यह कभी किसी से नहीं कहा। हालांकि इतना कहा जा सकता है कि उन सब के पास कहने को ऐसा कुछ था, जो उन्होने भी किसी भय या पूर्वाग्रह के कारण किसी से नहीं कहा होगा। एक शाम, हम दोनों ने एक ऐसा मंच तैयार करने का विचार भी किया था, जहां सारे लोग ऐसी बातें एक – दूसरे से साझा कर सकें। ऐसी बातें, जो मन के किसी हिस्से में लम्बे समय से  मौजूद हैं और बाहर आने को व्याकुल हों। यह मंच किसी भी सामूहिक स्थल जैसे बगीचे, किसी खुली – खाली जगह या किसी बड़े हॉल में बनाया जा सकता था। ऐसे मंचों के लिए कोई अपना घर कभी नहीं देता। घर किटी पार्टियों और जातिगत सम्मेलनों के लिए आरक्षित थे।

पिता जी जब आचार्य रजनीश ‘ओशो’, कार्ल माक्स या डेल कारनेगी को पढ़ते, तो मुझे पक्का यकीन हो जाता था कि अगले दिन वे जरूर बदल जाएंगे और कुछ क्रांतिकारी बातें करने लगेंगे। वे जाति जैसे निरर्थक पक्षों से स्वयं को मुक्त कर लेंगे। मैं, थोड़ा निराश होती, जब पिता को अगली सुबह भी बिल्कुल उसी तरह जाति के प्रति आसक्त पाती। मां कहती कि मैं प्रेम विवाह कर सकती हूं, लेकिन लड़का कम से कम किसी निम्न जाति या दूसरे धर्म का न हो। शायद उससे कुछ पहले या बाद के घण्टों में सारी मांएं अपनी युवा बेटियों से यही कह रही होती होंगी। मैं उनसे तेज आवाज में पूछती – क्या प्रेम जाति पूछ कर किया जाता है? वह मुझे ‘बेवकूफ’ घोषित कर समूची बहस को खारिज कर देती। वह जिस मासूमियत से मुझे बेवकूफ कहतीं, मैं उन पर नाराज नहीं हो पाती।

व्यवहारिक जीवन की सारी नसीहतों के मध्य, तुम किसी लहर की तरह ठहरते। बिल्कुल भारहीन। मिथ्या आदर्शों और निश्चित परिभाषाओं से बिल्कुल मुक्त। तुम्हे न किसी की घूरती नजरें परेशान करती। न ही तुम किसी के आकलनों या उलाहनों से विचलित होते। तुम सारी नियमावलियों और समय सारणियों की पोटलियां किसी जंगल में फेंक आए थे। तुम उस मानसिकता का मूर्त रूप थे, जिसे वास्तविक अर्थों में जीने का दुस्साहस मैं केवल कल्पनाओं में कर पाती थी। तुम उतने स्वतन्त्र थे, जितना मैं होना चाहती थी। इस तरह  ‘मैं’ ‘तुम’ में खुद को देखती थी। तुम ‘मैं’ में रुपान्तरित हो जाते थे। अमूमन यही कारण था कि बिल्कुल अलग व्यक्तित्व वाले हम दोनों भीतर से एक जैसे थे और प्रेम कर पाते थे।

बड़े होने की प्रक्रिया में हम बचपन की सहजता छोड़ते जाते हैं। मोटी – मोटी किताबें पढ़ कर गम्भीर व सयाने होने लगते हैं। बाकी काम जिंदगी खुद ही कर देती है। और जीते – जीते एक समय ऐसा आता है, जब हम दोबारा उतने सहज होना चाहते हैं, जितना बचपन के दिनों में थे। सहज हो सकने के लिए कई लोग आध्यात्म मार्ग का सहारा लेते हैं। इस प्रकार हम वहीं लौटने के लिए प्रयास करते हैं, जहां से हम ने जीवन यात्रा का आरम्भ किया था।

तुम तो जानते ही हो कि मैं वह बात सबसे आखिर में कहती हूं, जो सबसे शुरू में कही जानी चाहिए थी। स्वाभाविक रूप से लिखने की प्रक्रिया में निर्धारित क्रम टूट जाता है। निश्चित रास्ते मुझे कभी न याद रहे न रास आए। जैसे, मैं तुम्हे यह बताना चाहती थी कि कल शाम ही मैं और निष्काम हनीमून से लौटे हैं। ‘घूमना’ भी लिख सकती हूं, लेकिन ‘हनीमून’ शब्द सुन कर तुम्हे जरा अधिक बुरा लगेगा। मेरा दुष्ट मन थोड़ा सा तो यह कामना करता ही है कि तुम्हे बुरा लगे! रोना आए। रातों को नींद न आए। खैर, हम पूरा केरल घूम कर आए। निष्काम शिमला जाना चाहते थे, लेकिन मैने केरल जाने को कहा। मेरे कहते ही वे मान गए। बहुत ध्यान रखते हैं मेरा। बाहर हों, तो फोन करके पूछते रहते हैं। आज वह ऑफिस गए हैं। पहले ही बहुत छुट्टियां ले ली थीं न! निष्काम बहुत सधे हुए, सुलझे हुए इंसान हैं। सबसे बहुत अच्छी तरह बर्ताव करते हैं। ससुराल में तो मैं केवल पांच दिन ही रही। फिर, हम लोग केरल चले गए। और दस दिन घूम कर कल शाम ही लौटे हैं। अब कोई काम ढूंढना शुरू कर दूंगी। जिंदगी यूं घर बैठ कर तो नहीं गुजारी जा सकती। जिस फ्लैट में हम रहते हैं, बहुत खूबसूरत है। हर कमरा एयर कंडीशंड। हर चीज वहीं है, जहां उसे होना चाहिए। निष्काम को चीजों को इधर – उधर फैलाए रखना बिल्कुल पसंद नहीं है। बाहर एक छोटा सा बगीचा है। यहां गुलाब और दूसरे पौधों की कुछ क्यारियां हैं। मुझे यहां बैठना बहुत अच्छा लगता है। हमने सुबह की चाय यहीं पी। फिर धूप आ जाती है, तो सारा दिन अन्दर ही रहना होता है। बस एक ही कमी है। किसी भी कमरे में खिड़कियां नहीं हैं। रात को जब मैने कविता लिखना शुरू ही किया था और निष्काम मुझे बांहों में भरने लगे, कुछ घुटन सी होने लगी। गला रुंधने लगा। एकदम रुलाई फूट पड़ी। निष्काम तो बिल्कुल चौंक गए। पूछते रहे – क्या हुआ। मैने कह दिया – कुछ नहीं, मां की याद आ रही है। कुछ खास नहीं। अभी ठीक हो जाउंगी। फिर यहां – वहां, एक से दूसरे कमरे में खिड़की के पास बैठने के लिए दौड़ती रही। तभी गौर किया कि यहां एक भी खिड़की नहीं है।

तुम जानते हो मेरे लिए किसी से यूं अपना अकेलापन और उदासी बांटना इतना आसान नहीं है। मेरे जैसे  लोग, जब किसी भय के सामने आ खड़े होने के कारण, बिना खिड़कियों वाले घरों में बंद हो जाते हैं, तो सच कहती हूं, सांसें उखड़ने लगती हैं और जार – जार रोना आता है।

कल निष्काम का जन्म दिन है। सोचा था, उनके लिए कुछ लिखूंगी। उन्हें बहुत अच्छा लगेगा। वे हैं भी बहुत प्यारे। और देखो, जब लिखना शुरू किया और तुम्हारा खयाल आया, तो सब तुम्हे ही लिख दिया। अब लिख ही डाला है, तो दिल से चाहती हूं कि तुम इसे जल्द से जल्द पढ़ लो। सारी रात सो न पाओ और मेरी तरह रो दो। इतना तो तुम जानते ही हो कि तुम ठहरे मर्द, जिनके पास यूं सब के सामने रो पड़ने के बाद मां की याद या आंख में कचरा गिर जाने जैसा कोई बहाना भी नहीं होता!

तुम्हारी यादों से अधिक इस अफसोस में भी आंखें भीगती रहीं कि क्या हम दोनों कहीं गायब नहीं हो सकते थे? क्या शहर को इतनी फुर्सत थी कि हमारे जैसे आम लोगों के बारे में पन्द्रह – बीस मिनट से अधिक सोचे या बात भी करे? गायब हुआ जा सकता था। तुम अकेले गायब हो सकते थे लेकिन मेरे साथ कम से कम मां, बाबा और दीदी को भी गायब होना पड़ता। जानते हो, इतने सारे लोग एक साथ गायब नहीं हो सकते। इसीलिए मुझे इस घर में आना पड़ा, जहां एक भी खिड़की नहीं है। और अब इस आस को पकड़ कर ही जिंदा रहा जा सकता है कि धीरे – धीरे इस सब की आदत पड़ जाएगी। मुमकिन है, इसी में खुशी भी अपना रास्ता बना लेगी। तुम ने महसूस किया होगा कि कभी बत्ती चली जाती है और अंधेरा हो जाता है, तो हम एकबारगी परेशान हो उठते हैं। रोशनी के लिए यहां – वहां दौ दौड़ते हैं। लेकिन देखो, कुछ देर बाद अंधेरा हम में उतरने लगता है। वह हमें और हम उसे समझने लगते हैं। फिर वह विचलित नहीं करता। फिर न अंधेरों से कोई शिकायत शेष रहती है और न ही रोशनी के आने की प्रतीक्षा।

तुम्हारे खुरदुरे हाथ

सुबह आठ बजे ही दफ्तर पहुंच गई हूं। नया केबिन जो मिला है आज। सब कुछ बिल्कुल साफ – सुथरा। जमा हुआ। हर चीज, अपनी जगह पर। व्यवस्थित। जैसा, मैं हमेशा चाहती थी। सामने कांच की टेबल पर अखबार रखे हैं। खिड़की के पास कांच के गमले में पौधा रखा है। पौधों की मौजूदगी ताजगी बनाए रखती है ना! काम में गुम और फाइलों से घिरे रहने के दौरान याद आ जाता है कि पौधों का रंग हरा होता है। तुम्हारे अलावा किसे कह सकती हूं कि आज अपना केबिन मिलने पर मैं कितनी खुश हूं। तुम सामने होते, तो दौड़ कर तुम्हारे गले ही लग जाती। यहां दफ्तर में कोई बधाई भी देता है, तो जबरन खुद को संयत रख कहना पड़ता है – “ओह शुक्रिया। क्या फर्क पड़ता है। केबिन हो या डेस्क, काम ही तो करना है आखिर। अब, किसी को अपनी अपार खुशी जाहिर कर दूं, तो वह मुझे कितना अपरिपक्व समझेगा। सोचेगा, कि कैसा बचपना भरा है अब तक। बड़े होने का एक नुकसान यह भी है कि हम छोटी – छोटी बातों और उपलब्धियों पर अपना बहुत खुश होना यूं दिखा नहीं सकते। दफ्तर में तो बिल्कुल नहीं। फिर, मैं तो अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित रहती हूं। हां, तुम्हारे सामने गंभीरता ओढ़ने की कोई जरूरत नहीं। तुम तो बखूबी जानते हो पल – पल में मेरा बच्चा बनना और अगले मिनट बूढ़ा – सा महसूस करना। दुनिया भर की आंकलन करती आंखों के आगे हर वक्त जो बोझ लादे रखना होता है, तुम्हारे सामने आकर सारा भार उतर जाता है। कुछ वैसे ही, जैसे बच्चे घर में कदम रखते ही स्कूल बैग पलंग पर डाल देते हैं। बिना एक मिनट की भी देर किए।

कुछ फाइलों का बकाया काम आज ही पूरा करना है। डेस्कटॉप पर काम शुरू करने की कवायदों के बीच कुछ खलल उपज रहे हैं। कुछ धुंधले अक्स के आकार में। कुछ यादें मन के दरवाजों पर आ धमकी हैं। बिना दस्तक दिए। जैसे वे हमेशा आ खड़ी होती हैं। ना वक्त देखती हैं ना जगह। एक बारगी यदि अतीत के संदूक पर पड़े ताले टूटने लगे, तो उन्हें रोकना मुमकिन नहीं हो पाता। फिर एक – एक कर सब यादों की परतें उघड़ने लग जाती हैं। वह शाम रह – रह कर याद आ रही है। जेहन के किसी कोने में वह शाम बिल्कुल वैसे ही रखी है, जैसे उस दिन घटी थी। बिना किसी धुंधलाहट या भुलावे के।

अमूमन आधा घण्टे से हम दोनों साथ ही बैठे थे। एक ही टेबल पर। लेकिन आपस में जरा भी बात नहीं। बीती रात को एक – दूसरे से हमारी नाराजगी ने इतना उफान ले लिया था, कि रात भर जरा भी सो नहीं सके थे। सारी रात एक – दूसरे पर आरोपों के बाद खामोशियों का लंबा सिलसिला चला था। किसी तरह मिलने का तय कर अगली सांझ साथ बैठ भी गए, लेकिन बातचीत की पहल ना तुम करते थे, ना ही मैं अपने अहंकार को सरका कर बात शुरू कर पा रही थी। आधा घण्टे से तुम टेबल पर रखे पेपर नैपकिन को तोड़ – मरोड़ कर कभी नाव कभी हवाई जहाज बना कर वक्त काटने की नाकाम कोशिशों में लगे थे। और मैं अपने मोबाइल स्क्रीन में आंखें धंसा कर बैठी थी। इनबॉक्स में रखे सारे मैसेज भी चार मर्तबा पढ़ डाले थे। फिर भी घड़ी की सूइयां थीं कि आगे ही न बढ़ती थीं। आखिर, चुप रहने की हिम्मत ने जवाब दे दिया, तो मैने ही कुछ धीमे से कहा था – अपने हाथ देखे हैं तुम ने?

तुम पेपर नैपकिन में उलझे हुए ही बोल पड़े – हां। इसमें देखना क्या है! मेरे ही हाथ हैं।

अरे, कितने मैले और काले लग रहे हैं। अंगुलियों के बीच वाले हिस्से को देखो, जरा। कितना सख्त लग रहा है। बिल्कुल, जैसे बूढ़ों के हाथ होते हैं। अगर कोई सिर्फ तुम्हारे हाथ देखे, तो तुम्हारी उम्र का अंदाजा लगाएगा कम से कम पचास बरस। इस बार मेरी आवाज पहले से कुछ तेज थी।

क्या कह रही हो! तुम्हे हंसी आ गई थी। तुम बिल्कुल उन्मुक्त हंसने लगे थे। यूं हंसता देख मुझे तुम पर लाड़ – सा आने लगा, लेकिन खुद को रोकते हुए मैने बातचीत की गम्भीरता को जबरन जकड़े रखा। तब तक चाय भी आ गई थी।

मैने जरा नाराजगी दिखाते हुए कहा – तुम किसी भी बात पर गम्भीर ही नहीं होते। बस, हंसने लगते हो। हाथ देख कर लगता है जैसे मजदूरी करते हो।

अरे, बाबा। मजदूरी नहीं करता, लेकिन सारी दुपहरी यहां – वहां दौड़ता रहता हूं। बार – बार ग्लव्स पहनने का वक्त नहीं मिलता। सच कहूं, तो जल्दबाजी में दस्ताने जैसी चीज जरा भी याद नहीं पड़ती। अब तुम हाथों को जाने दो और चाय का कप थामो। तुम ने फिर माहौल को हल्का करने की कोशिश में कहा।

फिर वही। हर बात को हवा में उड़ा दो। इसमें तो महारत हासिल है तुम्हे। मेरी किसी बात पर जरा भी ध्यान नहीं देते। अब साथ – साथ इतना वक्त जो गुजर गया है। भला मेरी बातों से तुम्हे क्यों फर्क पड़ेगा अब। शुरुआती दिनों में यह कहती, तो अब तक सौ मर्तबा हाथ किसी हैंड वॉश से रगड़ – रगड़ कर धो चुके होते। मेरी आवाज की तेजी जस की तस थी।

ठीक है, घर जाते ही सबसे पहले हाथ अच्छे से साफ करूंगा। तुमने वायदा करने के अंदाज में कहा था।

सिर्फ साफ करने से क्या होगा! और तुम्हारा साफ करना तो मैं जानती ही हूं।

तो और क्या करूं? तुमने झट से सवाल खड़ा कर दिया।

देखो, एक बाल्टी पानी गर्म करना। गुनगुने होने तक ही। उसमें शैम्पू, नमक, नींबू के रस की कुछ बूंदे डाल देना। फिर, उसमें अपने हाथ कम से कम पन्द्रह मिनट तक डाले रखना। और जब इतना सब कर ही लो, तो अपने पैरों पर भी जरा दया कर देना। मैने मैनिक्योर की पूरी विधि उंडेल दी थी।

ठीक है। पक्का। रात को सोने से पहले जरूर कर लूंगा। ना करूं, तो तुम फोन करके याद दिला देना। अब ठीक है। मुझे आश्वस्त करने और बात को खत्म करने के अंदाज में तुम ने कहा था।

ठीक है। तुम्हारी आंखों में झांकते हुए मैने कहा था।

तुम भौहें ऊपर करते हुए चिढ़ाने के अंदाज में बोले – अब मुस्कुराने का क्या लोगी, बाबा!

बहुत देर से रोकी हंसी आखिर फूट ही पड़ी।

आज भी ठीक वैसे ही हंसी दबी हुई रखी है, जो सिर्फ तुम्हारे सामने ही यूं फट पड़ सकती है। यूं तो हम हंसी और रुलाई, एक उम्र तक दोनों को गले में रोके रखना सीख ही लेते हैं। फिर भी कोई एक शख्स तो ऐसा होता ही है, जिसके सामने यह रोकथाम की कोशिशें खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं। डेस्कटॉप पर दिखता धुंधलका छंटने लगा है। तुम्हारे हाथ बन रहे हैं वहां। बिल्कुल तुम्हारे हाथ। सांवले – काले से। सख्त – खुरदुरे से। मेरे लाख कहने पर भी तुम ने कभी उन्हें मुलायम या साफ करने की कवायद में वक्त नहीं गंवाया। मालूम है, यहां सभी के हाथ बहुत साफ दिखते हैं। बिल्कुल चमकते से। जैसे, अभी अभी हथेलियों पर महंगी क्रीम से मेहनत की गई हो। इन चमकते हाथों से आकर्षित तो हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें छूने को मन नहीं करता। एक अजीब – सा डर पनप जाता है कि उनकी चमक फीकी ना पड़ जाए। इस चमक के बीच तुम्हारे हाथों का खुरदुरापन ऐसे ही याद आता है जैसे नए शहर की भीड़ में मां का खयाल। जैसे धूप के सायों में मुट्ठी – भर छांव। जानते हो, तुम्हारे हाथों की शक्ल उभरते ही जो अगली चीज याद आती है, वह है पहाड़। तुम्हारे हाथों और पहाड़ों में कुछ एक – सा है। मालूम नहीं, क्या। तुम्हारे हाथ, जिन्होंने कितनी ही बार मुझे जाते – जाते रोक लिया था। आंसूओं को गालों पर लुढ़कने से पहले थाम लिया था। अब सोचती हूं, कि तुम शायद  इसीलिए उन्हें ज्यादा साफ नहीं करते थे कि कहीं मेरे आंसू धुल ना जाएं। अगली बार मिलो, तो मुझे सारे आंसुओं के निशां दिखाना। हम उनकी वजहें ढूंढेंगे। जिन बातों पर कभी रोए थे, इस बार हंसेंगे। अभी बस इतना ही कह सकती हूं – इन उजली परतों के बीच बहुत याद आ रही हैं,  दुनिया में सबसे अधिक नर्माहट देने वाले तुम्हारे सबसे खुरदुरे हाथ!

तुम ने नाखून देखे हैं मेरे!

कमरे की छत से टकराती हुईं मेरी आंखें फर्श पर आ कर रुक जाती हैं। आंखें, कभी दाईं ओर की दीवार से नजरें मिलाती हैं, फिर सामने खिड़की पर लौट आती है। आंखों का इर्द – गिर्द झांकना बताया जा सकता है, लेकिन जेहन को कितने खयाल खंगालते हैं, क्या कहा जा सकता है?

जाने किस उधेड़ बुन में जुटा रहता है मन!  आज सुबह ही नहाने के बाद भी खुद पर देर तक पानी डालते – डालते कितना कुछ उमड़ता – उफनता रहा भीतर। जब मां ने आवाज दी, तो ध्यान भंग हुआ और खयाली दुनिया से बाहर आई। मां को कुछ अजीब महसूस होता है मुझे देख कर , कहने लगीं – क्या सोचती रहती हो सारा दिन, कमरे में अकेले क्या करती रहती हो। सच, मुझे भी इस सवाल ने जैसे सावधान कर दिया – आखिर सारा दिन मैं कमरे में नितान्त अकेले क्या करती हूं। कुछ ज्यादा काम भी नहीं होता। सारा दिन में अखबारों के अलावा किसी किताब का कुछ हिस्सा ही पढ़ पाती हूं, लेकिन इस सब में पूरा दिन तो नहीं गुजर सकता। एक बारगी खयालों में गुम होती हूं तो घड़ी में घण्टों बीत जाते हैं। कहीं यह पागलपन की प्रारम्भिक अवस्था तो नहीं है? एक विचार उपजता है, यदि कोई मुझे कैमरे में कैद कर ले और किसी को दिखा दे, तो यकीनन मेरा पागल होना साबित भी हो जाएगा।

शायद मैं अपने अस्तित्व को लेकर बुरी तरह भयभीत हूं। कौन हूं मैं?  किस दिशा की ओर बढ़ रही हूं?  क्या यह राह मुझे कहीं ले भी जाएगी या यूं भटकना ही मेरा जीवन बन जाएगा?  क्या मैं तुमसे यूं ही प्रेम कर सकूंगी?  क्या हम कभी साथ हो सकेंगे? क्या कोई समझ सकेगा हमारे साथ होने को?  क्या किसी और का हाथ थाम सकूंगी? सवालों में शुरू हुई सुबह दुपहरी में ढल जाती है, शाम सवालों के साथ बढ़ती हुई अंधेरी रात बन जाती है, लेकिन ये सवालों का सिलसिला नहीं थमता।

मां कहती है – सब दूसरी लड़कियों की तरह तुम खुश क्यूं नहीं रहतीं?  कहीं जाती भी नहीं इन दिनों। क्या हुआ जा रहा है तुम्हे?  मां मेरी उदासी भांप लेती हैं, लेकिन आंखों का खालीपन नहीं पढ़ पातीं। बड़े होते – होते हम मां से भी कितना दूर हो जाते हैं! वह अपेक्षाओं और उलाहनों के जाले बना देती हैं चारों ओर, जिनसे निकलने की नाकाम कोशिशें भी मैं नहीं करती अब। कभी – कभी दिल करता है कि मां की गोद में सिर रख कर, जार – जार बह जाऊं और कह दूं कि मां, मैं दूसरों जैसी नहीं बन सकती। क्या इंसान किसी कारखाने के सांचे में ढलकर निकलने वाला पुर्जा है, कि सब एक ही से निकलें। मुझे कपड़ों और लिपस्टिक के रंग के बारे में बातें करना पसंद नहीं है, तो क्या यह गलत है?  कविताएं लिखना, मेरे लिए खुद को कहने का जरिया है। किताबों के पन्ने मेरे साथी हैं। घर लौटने को मन नहीं करता। घुटन – सी होने लगती है। सांस ही नहीं ले पाती इन बंद दीवारों से घिरे घर में। मैं दुनिया देखना चाहती हूं। नए शहर, नई गलियां, नए चेहरों से खुद को साझा करना चाहती हूं। मां, तुम्हे यह सब बता भी दूं, तो क्या तुम समझने की एक अदद कोशिश भी करोगी?

तुम ने नाखून देखे है मेरे! कितने भद्दे दिखते हैं न!  दातों से काट लिए मैने, पता नहीं कब!  एक अजीब किस्म के डर ने घेर  लिया है। लगता है, जैसे पूरे शरीर पर केंचुए रेंग रहे हों। इन केंचुओं ने मेरी नींद पर कब्जा जमा लिया है। एक पल को भी मुझे अकेला नहीं छोड़ते। इनका इस कदर रेंगना मुझे खाता जाता है रोज। क्या मैं खत्म होती जा रही हूं?  क्या मैं डूब रही हूं? हां, ये केंचुएं मुझे बहुत डराते हैं, इतना दौड़ाते हैं कि पसीना – पसीना हो जाती हूं।  बिल्कुल थक जाती हूं, लेकिन थम नहीं सकती।  थम पाती ही नहीं चाह कर भी। मैं शायद तैर रही हूं। जानती हूं, मुझे तब तक तैरना होगा, जब तक कि किसी किनारे का पता न ढूंढ लूं।

हमारे घर मां के सपनों की लाशों पर खड़े हैं!

मेरे ठीक सामने खड़ी है मां। एक से दूसरे कमरे में घूम रही है। कुछ तलाशती हुई – सी। माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। पूछने पर झल्ला कर कहती हैं – “तुम्हारे पापा का फोन आया था अभी। उनकी कोई जरूरी फाइल गुम हो गई है। वही ढूंढ रही हूं।”

मां अकसर यूं ही, किसी के लिए कुछ ना कुछ खोजने में बदहवास जुटी रहती है। कभी पति की फाइल, कभी बेटे का लाइसेंस तो कभी बेटी की गाड़ी की चाबियां। ऐसा कोई दिन याद ही नहीं पड़ता जब वे खुद की कोई चीज ढूंढ रही हों। हर वक्त उनकी जेहनियत कमोबेश घर से चिपकी हुई रहती है। बाहर चली जाती हैं, तब भी घर के धागों से स्वयं को आजाद नहीं कर पाती। मां का एक हिस्सा घर में ही रह जाता है। हर बार, मां यह हिस्सा घर में ही छोड़ जाती हैं। बहुत दूर होकर भी वह महसूस होती है, घर के आंगन में। कपड़ों के बढ़ते ढेर में। बर्तनों की बिखरी अलमारी में। चूल्हे पर सिकती अधपकी रोटियों में। लगभग जल चुकी सब्जी में। ना घर कभी मां को छोड़ता है, ना ही मां घर को। मां, घर में इतने गहरे तक होती है कि उनके होने का भान ही नहीं होता। लेकिन जब वह घर में नहीं होती, घर उन्हें याद कर बहुत सिसकता है।

पति, बच्चों और परिवार वालों के जन्मदिन पर मिठाई बनाते – बनाते मां को कभी अपना जन्मदिन याद नहीं रहता। याद हो, तब भी यह दिन मनाने को लेकर वह खास उत्सुकता नहीं दिखाती। क्या वह किसी भी बारे में उत्सुकता दिखाती है? वह उलझी रहती है दिन – रात चाय, नाश्ता, टिफिन, रोटी, सब्जी, अचार, बर्तनों और कपड़ों में। आते – जाते एक ही प्रश्न रख देती है – “आज खाने में क्या बनाऊं?” यह सतत सिलसिला उसे इतना उलझाए रखता है कि डर लगता है कि किसी रात वह नींद में उठकर भी सब्जी और परांठों की बातें ना करने लगे। हर अर्थ में घर ही उनका संपूर्ण संसार है। वह देश की आर्थिक स्थिति के बारे में होने वाली चर्चाओं में हिस्सा नहीं लेती। ना ही राजनीतिक उथल – पुथल के बारे में चिंता जताती है। उनकी तमाम  बातें घर से ही शुरू होती हैं और वहीं खत्म हो जाती हैं।

सुबह आंख खुलने में कभी देर नहीं होती। मां, काम से कभी छुट्टी भी नहीं लेती। विशुद्ध नियमों से बंधा जीवन जीती हैं मां। जबकि उन्हें ना ही उन्हे पदोन्नति का कोई प्रलोभन होता है, ना ही प्रशंसा की अपेक्षा। कुछ भी नहीं है मां के पास, उनका अपना। पहचान भी नहीं। नाम भी नहीं। कोई पूछता है – आप हाउसवाइफ हैं? और वे सहजता से हां में सिर हिला देती है। क्या याद पड़ता है कि मां परिचय देते समय अपना नाम बताती हों। उनके मायके वालों के अलावा रोज घर आने वालों में भी कितने लोग उनका पहला नाम जानते होंगे? सबसे विचित्र तो यह है  कि इस सब को लेकर, मां विचलित भी नहीं होती। आपत्ति भी नहीं दर्ज करती। प्रश्न भी नहीं करती। जो घटता है, सब कुछ ग्रहण करती जाती है। डरा देती है यह ग्राह्य क्षमता।

एक प्रश्न तैरता है – या तो मां महान है या बेहद समझौतावादी?  एक दुपहर आंखों के सामने आ जाती है। उस दुपहरी मां की आंखों में आंसू थे। हमेशा दूसरों की चिंता में घुली रहने वाली मां उस दिन अपने स्कूल में पढ़ाने के सपने की मौत पर रो पड़ी थी। इतने बरस गुजर जाने के बाद भी उस सपने की मृत्यु की स्मृतियां उनकी नम आंखों में झलक आई थीं। उन्होने अपनी पीली साड़ी के कोने से तुरन्त कोरों की नमी पोंछ ली थी। संभव है, वह अनजाने में भी मुझ पर यह असर नहीं छोड़ना चाहती थी कि वह अपने गृहस्थ – संसार में किसी स्वप्न का शव ढो रही हैं। स्वार्थी हो रही हैं। सो, उसी क्षण बात पलटते हुए उन्होने मुझ से अपना पसंदीदा प्रश्न दोहरा दिया – “खाने में क्या बनाऊं?”

अपने समझौतों को जाहिर नहीं करने वाली मां के आंसू मैने देखे थे। सिर्फ मैने। और इतना भर जान लिया था कि हम सब के घर मांओं के सपनों की लाशों पर खड़े हैं!

उसका पेट सिर्फ भूख से भरा है!

मेरे रसोई घर में रखे डिब्बे में दस रोटियां हैं। खाने वाला, मेरे अतिरिक्त कोई नहीं है। सब शहर से बाहर हैं। भूल से ज्यादा रोटियां बना दी गईं, रोजमर्रा की आदत के चलते।

उसके कच्चे घर में दस लोग हैं। रोटी सिर्फ एक। उसका पेट सिर्फ भूख से भरा है और गला केवल प्यास से। हिम्मत और हौसले की आखिरी बूंद के खत्म होने तक रोटी का इंतजाम नहीं हो पाने पर वह बदहवास यहां – वहां दौड़ता है। पड़ौस के इलाके में स्थित एक घर के बरामदे में वह थाली में एक के ऊपर एक रखी दस रोटियां देखता है। इत्तेफाक से यह मेरा घर है। रोटियां कुछ देर पहले ही खुले में रखी गई हैं, ताकि गाय या कुत्ते खा सकें। वह भूखा आदमी तुरन्त आठ रोटियां उठा लेता है। मोहल्ले के दो समझदार लोगों की नजर उस पर पड़ती है। उसी क्षण उसे पकड़ा जाता है। भूखी आंतों पर भारी हाथों से घूंसे – थप्पड़ पड़ते हैं। भूखा आदमी चक्कर खा कर गिर जाता है। बिना कोई सफाई दिए।

रोटियां सड़क पर यहां – वहां बिखरी पड़ी हैं। थाली में बची दो रोटियों को एक गाय चबा रही है। सभ्य और सयाने लोगों ने उसे चोर घोषित कर दिया है। मैं मूक दर्शक की तरह जड़वत सब कुछ देख रहा हूं।

वक्त के साथ बीतती मैं

किसी रहस्यात्मक पहेली की तर्ज पर आगे बढ़ रही है जिंदगी। जैसे, किसी अनजान सफर के बीच हों। कुछ नहीं मालूम, कौनसी सड़क होगी अगले मोड़ पर। सिर्फ ढेर सारी अनसुलझी गुत्थियों की पगडण्डियों के सहारे चलती जा रही हूं। जीवन के संदर्भ में गहन पड़ताल करने के बावजूद कौन जान सका है इसे? हम सभी अपने हिस्से की धूप – छांव के साथ इस सफर पर चलते रहने को नियतिबद्ध हैं।

सवेरे से सांझ तक, अंधियारों से उजालों तक खुद को अनगिनत गुत्थियों में बंधा हुआ पाती हूं। वक्त बीतता जा रहा है। वक्त से ज्यादा शायद मैं बीतती जाती हूं। समय की कड़वाहटों में घुलती जाती हूं। थोड़ा – कुछ समेटने में बहुत कुछ छूटता जा रहा है। कुछ नहीं बटोर पाती मुट्ठियां। आगे बढ़ जाती हूं। फिर जब फुर्सत में पीछे मुड़कर देखती हूं, तो पाती हूं कि मेरा एक हिस्सा तो कहीं बीच सफर ही छोड़ आई हूं। अब फिर पीछे लौटना होगा। यकीनन, बीते लम्हों में लौटना तुम्हे वह सब कुछ दोबारा याद दिला देता है, जो तुम लंबे अरसे से भूलने की नाकाम कोशिशों में जुटे हो। बीते वक्त ने देखा है कि किस कदर वायदों की पोटली मेरे हाथों में रख, मेरी आंखों को चूम कर कोई लौटा नहीं है अब तक। मुमकिन है, वह मेरी सूरत भूल बैठा है।  मैं, कब से यहां अकेले, बिल्कुल तन्हा उन वायदों की पोटली का बोझ ढोती रही हूं। अब, कन्धे बहुत थक चुके हैं। उम्मीद में डुबोकर, कुछ बैसाखियां गढ़ी थीं। अब वे भी चरमराने लगी हैं। गिरने से पहले संभालना होगा खुद को। समझना होगा, वह भी एक राहगीर ही था, बस!  राहगीर कुछ पल साथ रह सकते हैं, ताउम्र नहीं।

कहीं ऐसा तो नहीं है कि वह भी मेरी प्रतीक्षा में हो!  कहीं, मैं ही तो किसी गलत रास्ते पर नहीं चल पड़ी?  क्या यहीं हमारा मिलना तय हुआ था?  सब धुंधला हो रहा है।  कुछ साफ – साफ याद नहीं आता। लेकिन, उसने कहा था कि वह मुझे किसी भी स्थिति में ढूंढ लेगा। वह मुझे पहचान लेगा। फिर क्यूं इतनी देर हो चुकने पर भी वह आता ही नहीं दिखता?  क्या वह प्रेम था या मन ने कोई भ्रम जाल रचा था?  सोचती हूं, सब कुछ छलावा भर ही रहा होगा  प्रेम के पहनावे में आए सुन्दर छलावे कितना ठगते हैं हम सभी को। हम सभी ठगे गए हैं इस छलावे के हाथों!

प्रेम साथ हो, तब भी अपनी उनींदी आंखों और बोझिल पलकों का भार अकेले ही उठाना होता है। खुद को तुम से बांटने का प्रयास करूं, तब भी क्या मेरी बेचैनियां तुम तक उसी गहराई के साथ पहुंच पाती हैं, जितनी गहनता के साथ वे मुझ से चिपकी हुई हैं?  जो चुप हुई सिसकियां बिखरी पड़ीं हैं, कुछ बाहों में बटोरती हूं। कुछ कन्धों पर लादती हूं। कुछ मुट्ठियों में भींचती हुई दौड़ती हूं। इतना तेज दौड़ती हूं कि सहसा याद हो आता है कि मैं नंगे पैर ही कांटों पर दौड़े जा रही हूं। जूते, जाने कौन मोड़ पर छूट गए। बुरी तरह लहूलहुान हुई हूं। लेकिन अगले ही क्षण खयाल उपजता है कि अब खून से सने पैरों को धोने का वक्त नहीं बचा है। इन जख्मों के साथ ही दौड़ना होगा। दौड़ते जाना होगा, अनवरत, सदा के लिए। कभी ना लौटने के लिए।

अब वो कहां रहेंगे?


 

दो दिन पहले तक सड़क के उस पार कई चूल्हे जलते थे। कई मैले-कुचैले बच्चे बिना चप्पलों के खेलते रहते थे। फटे चिथड़ों, थैलियों और बोरियों से बने घरौंदे बसते थे। किसी शादी-समारोह के वक्त औरतें नाचती-गाती थीं, बच्चे ढोल पीटते थे। कभी कचरा बीनते थे, कभी घर-घर जाकर खाना मांगते थे। वे फुटपाथिए थे। आज सड़क के दोनों किनारे बिल्कुल खाली थे।दोनों सैर पर निकले थे। दोनों…मतलब 55 साल के दादा अपने पांच बरस के पोते के साथ। दादा जी की उम्र इतनी थी कि वह पोते की मासूमियत पर मुस्कुराने के सिवाय उस से ज्यादा बात नहीं करते थे। पोते की बहुत जिद के चलते उन्हें उसे साथ लाना पड़ा था। दोनों सड़क पर टहल रहे थे, आज सड़क कुछ ज्यादा ही खुली लग रही थी। दादा जी ने खुद से कहा – “इन लोगों ने सड़क को कब से खराब कर रखा था। आज जब सरकार ने यहां से इन्हें हटा दिया, देखो…कितना खुला-खुला लग रहा है। कोई बता रहा था, यहां एक फाइव स्टार होटल और फ्लेट्स बनेंगे। अच्छा ही है, फिर घर की रेट्स भी काफी बढ़ जाएगी।” खुद को शुभ समाचार देने के बाद वे हल्के – से मुस्कुराए।पोते ने अगले ही मिनट तपाक से पूछा, जैसे बच्चे पूछ लेते हैं  – लेकिन बाबा, अब वो बच्चे कहां रहेंगे? क्या उनको दूसरा घर  मिल गया? उनको खाना कौन देगा?दादा जी ने रुक कर बच्चे की ओर देखा। तब तक घर आ चुका था। वे अपने कमरे में पहुंचे और चुपचाप कुछ देर लैटे रहे। शायद वे भी यही सोच रहे थे, कि हम बड़े कितने संवेदनहीन हो जाते हैं। तभी फोन की घंटी बजी और वे किसी से बातों में मशगूल हो गए। बातों-बातों में वे फोन पर कहने लगे, “देखो, सरकार ने एक अच्छा काम तो किया कम से कम। अब  प्रॉपर्टी के रेट्स भी बढ़ जाएंगे”…

बड़ों को बहुत सारे काम होते हैं। बच्चों की तरह इतनी छोटी-छोटी बे-मतलब की बातें उन्हें ज्यादा देर याद नहीं रहती।

‘गरीबी’ पर बोलना है!

यह तीसरी ड्रैस थी…और संगीता को यह भी पसंद नहीं आई। इस बार उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। झल्लाकर उसने ड्रैस को पलंग पर फेंक दिया। संगीता ने डिजाइनर को एक हफ्ते पहले ही ड्रैस बनाने को कह दिया था, फिर भी उसने अब तक ड्रैस तैयार नहीं की थी। अलमारी में रखी तीन नई ड्रैसेज वह पहन कर देख चुकी है, लेकिन कोई भी अच्छी नहीं लग रही। वह कमरे में यहां से वहां चक्कर काट रही है। उसे चार बजे निकलना है और घड़ी में ढाई बज चुके हैं। उस पर जाना भी दूर है, एक घंटा तो पहुंचने में ही लग जाएगा।

वह झल्ला कर पलंग पर बैठी, एक लंबी सांस ली और ड्राइवर को फोन लगाकर बोली – गाड़ी बाहर निकाल लो, थोड़ी देर में निकलना है। संगीता ने अगला फोन डिजाइनर को लगाया। वह सुबह से उसे कई मर्तबा फोन लगा चुकी थी, लेकिन उसने एक बार भी जवाब नहीं दिया था। इस बार डिजाइनर ने फोन उठाकर कहा – मैडम, घर पर कुछ प्रॉब्लम हो गई थी, इसीलिए आपका फोन नहीं उठा पाया। आपकी ड्रैस तैयार है, लेकिन मुझे आपके घर पहुंचने में एक घंटा तो लग ही जाएगा। यह सुनकर संगीता ने कुछ चैन की सांस ली और बोली – ठीक है, वैसे तो मुझे चार बजे ही पहुंचना है, लेकिन आधा घंटा देर तो चल सकती है। और…सुनो, ड्रैस हल्के रंग की ही बनाई है ना, मुझे ‘गरीबी’ पर बोलने के लिए बुलाया है, कुछ कच्ची बस्ती के बच्चों को कपड़े-किताबें वगैरह भीं बांटने को कहेंगे। जी मैडम, हल्के पीले रंग की ही ड्रैस है, आपकी फोटो उसमें अच्छी आएगी, यह कहकर डिजाइनर ने फोन रख दिया।