बंधुआ जीवन या मुक्त मृत्यु

 

तुम ने मेरी आत्मा की हत्या की थी
(इस दौर में ‘आत्मा’ की बात करना किसी खतरे से खाली नहीं है)
मैं सिर्फ तुम्हारी देह का अन्त कर सकी हूं
फर्क सिर्फ इतना भर है
कि मेरी मृत्यु और तुम्हारा अपराध
विश्व के किसी भी न्यायालय में
नहीं हो सकेगा प्रमाणित

जब – जब तुम झांकोगे इतिहास की गर्द में
वह तुम्हारी आंखों में आंखें डाल कर कहेगा
हजारो मर्तबा मैने मांगी थी
तुम से और इस समूचे संसार से
अपने हिस्से की पूरी आजादी

तुम्हारी हत्या ही मेरे लिए अन्तिम मार्ग था
उन सुविधाओं से युक्त कैदगाह से मुक्त होने को

समय साक्षी है
कि हत्या के क्षणों में मेरे हाथ कांपे थे
और मैने भय को अपनी धमनियों में महसूस किया था

मेरे समक्ष दो ही विकल्प थे
बंधुआ जीवन या मुक्त मृत्यु
मैने ‘मुक्त मृत्यु’ को चुना।

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आत्मघाती स्त्रियों की आत्माएं

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तुम ने हर मर्तबा
मुझे महसूस करने के उपरान्त
मेरे सौन्दर्य पर गढ़ी एक कविता

बढ़ता गया कविताओं का पुलिंदा

मै जीवन पर्यन्त कैद रही अपनी देह में
संसार की सारी स्त्रियों की तरह
प्रति क्षण सड़क, चौराहों और घरों में
उन्हें याद रखवाया गया
कि वे स्त्रियां हैं

उनमें कुछ दुस्साहसी स्त्रियां
समाज की उस सड़ांध भरी नाली से प्रतिशोध चाहती थीं
जिसमें बह गया उनका समूचा जीवन
उनकी रातें मचलती थीं कुछ हत्याएं करने को
और आखिर में उन्होने सामूहिक आत्महत्या की

सामाजिक बाध्यताओं और विवशताओं में
लिपटा रहा अस्तित्व

आखिर धैर्य भी कितना धैर्य रख पाता
शायद उन आत्मघाती स्त्रियों की आत्माओं ने
हम में फूंक डाला साहस
और आज हमारे नाखूनों में
उनकी त्वचा के रेशे हैं
जो हवस के साथ बढ़े थे हमारी ओर

तुम अगली बार जब लिखोगे एक कविता
वह निश्चित ही मेरे साहस पर होगी।

आइने के पीछे भी कोई आइना हो सकता है

यह एक विचित्र प्रकार का समय है
जिसने हमारी आंखों पर एक विशेष चश्मा चढ़ा रखा है
हर एक व्यक्ति अपने उसी चश्मे से देखता है दुनिया
और जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना

समूचा जीवन क्या है
एक अनन्त रहस्य के अतिरिक्त
हम अपनी आंखों की पुतलियों के
फैलने जितना भर ही देख और समझ पाते हैं जीवन
जबकि हमें यही भान होता है
कि हम जानते हैं

घरों की छतों पर चिपकी रहने वाली छिपकलियां
और कमरों में कूदते रहने वाले चूहे
शायद हम से अधिक और प्रथम अधिकारी हैं यहां रहने के
वे यहां तब से हैं, जब हमारे घर खाली जमीं थे
और यह भूला नहीं जाना चाहिए
कि हम ने उनके बिलों पर अपने कमरे खड़े किए हैं

मुमकिन है किसी रात जब आप सोए हों
चादर तानकर, तकिए में मुंह दबाए
चींटियों का कोई झुण्ड आपके घर की दीवारें खोखली कर दें
और आप यह जान पाएं
कि उन्होने आपके नहीं, बल्कि आपने उनके
जीवन में हस्तक्षेप किया है
और आप महज इसलिए सही नहीं हो जाते
क्यूंकि आप उनसे कहीं अधिक बड़े और ताकतवर हैं

अमूमन आइने में खुद को देखते हुए
हम यह नहीं जानते कि शायद
आइने के पीछे भी कोई आइना हो सकता है!

अपेक्षाओं के तन्तु



घर प्रेम दे सकते हैं
साहस नहीं
वह तो खुरदुरी सड़क ही सिखा सकती है

हर मर्तबा थाली में रखी गई
रोटियों के साथ
परोसे गए कुछ उलाहने
सब्जी की कटोरी के तले
पाए गए अपेक्षाओं के तन्तु

संवेदना हर बार मुझ तक लौटी
वेदना बन कर

मां का सुन्दर ललाट
देख ही जिया जा सकता था
भय के इस दौर में

एक बहुत लम्बे अरसे से
उसने भी सब के नाश्ते, कपड़े, इस्त्री, मंदिर
और बहुत कुछ इतना याद रखा
कि इन दिनों उसे कुछ याद नहीं रहता

क्या उस पीड़ा को
रुदन में समेटा जा सकता है
जिस दुपहर तुम्हारी मां
तुम्हे पहचान ही ना पाए
और कोई नहीं बचे
घर पर तुम्हारी प्रतीक्षा में
घड़ी देखते रहने को।

क्या शहर को हमारा गायब होना याद रहता!

कितनी भी गम्भीर बात कहती, तुम उसे अपने लतीफों में उड़ा देने में माहिर थे। ऐसा करने में जरा भी देर नहीं लगाते। आज जब हमें जिंदगी ने और जिंदगी को हम ने कुछ अधिक ही गम्भीर बना दिया है, तुम्हारी बे – सिर – पैर नुमा हरकतें रह रहकर याद आती हैं। लिखते वक्त इस कोरे सफेद कागज में महसूस होती रही तुम्हारी शरारती सांवली सूरत। चेहरे की एक – एक हरकत, जो तुम हंसाने के लिए किया करते थे।

तुम जानते थे, ये तो होना ही था एक न एक दिन। मैं भी जानती थी कि एक रोज तुम्हारे बारे में तुम्हे जरूर लिख रही होउंगी। मालूम तो तुम्हे भी था, लेकिन तुम जिंदगी को फिक्र के जालों में उलझाना नहीं चाहते थे। तुम किसी बात को लेकर चिंतित नहीं होते थे। कभी भी नहीं। कभी कोई भय नहीं होता था तुम पर। हम सब अपने अपने हिस्से के डर, चिंताओं और असुरक्षाओं में कैद थे, वहीं दूसरी ओर तुम थे। निरे आजाद। मुक्त। निश्चिन्त। सच कहूं, तो तुम्हारी इस बेफिक्री से बहुत रश्क होता था। मैं जानती थी कि हमारा प्रेम कहीं नहीं पहुंचेगा। हम कभी साथ नहीं हो पाएंगे। इस संशय ने मेरे मन का एक हिस्सा रिक्त कर दिया था। जब आप अंतस की गहनता तक प्रेम जी रहे हों और उसके कल को लेकर उतने ही आशंकित भी हों, तो एक अनकही रिक्तता का घेर लेना स्वाभाविक है। कई दिन ऐसे होते थे, जब कुछ महसूस होना जैसे बंद ही हो जाता था। कुछ रुंध जाता था मन के दरवाजे पर। ऐसे समय में कोई आपको प्रेम में चूम ले या अपशब्द कह डाले, आप कोई प्रतिक्रिया नहीं करते। ना रुलाई फूटती है ना हंसी। खुद से एक भय का भाव उपजा दिया था उस समय ने। सबसे ज्यादा भय हमेशा खुद से ही होता है। सबसे ज्यादा शिकायतें और तकलीफें भी। हम सब भीतर बहुत सारा भय और संशय लेकर जीते हैं। जान बूझकर खुद को काम में इतना मसरूफ कर लेते हैं, ताकि यह भय हमारे सामने आकर खड़ा न हो जाए। हम उसे पीछे धकेलते रहते हैं। नीचे दबाते रहते हैं। जैसे मां अपने सारे भय रसोई में रख आती है या कपड़ों में धो डालती है। हम भी उन्हें सरकाते रहते हैं। कभी काम की आपाधापी में। कभी घर – गृहस्थी की चीजों में। कभी यहां – वहां खरीदारी या खाने – पीने जैसी बातों में। कभी अंधेरे में बड़े पर्दे पर सिनेमा देखने में। लेकिन इतना तो हम जानते हैं कि कितना भी सरका दिया जाए, किसी दिन तो फुर्सत होगी। तब वे भय इर्द – गिर्द फटकने लगेंगे। यदि लंबे जिए, तो बुढ़ापे में यह फुर्सत जरूर हमारे हिस्से में आएगी। उस समय करने को इतना काम नहीं होगा। शरीर असहाय हो चुकेगा। बुढ़ापे में वक्त इतना होता है कि हर घण्टे उठ – उठ कर घड़ी देखनी पड़ती है। तब वे भय हमारे अंतस के भीतरी कोनों से निकल कर बाहर आ जाएंगे। हमारे साथ बिस्तर पर सोएंगे। हमारे साथ उठेंगे। साथ रोएंगे।

हम साथ – साथ इतना घूमते थे कि शहर भर की सारी जगहें खत्म हो जाने को थीं। कोई नई जगह नहीं बची थी। शहर बहुत छोटा पड़ने लगा था। शहर से भी छोटे वे दिन थे, जब हम साथ होते थे। दिन को हमारा साथ रहना मंजूर नहीं होता था। वे बहुत जल्दी ढल कर शाम में तब्दील हो जाते थे और फिर हमें अलग होना होता था। रातें लम्बी होतीं और फिर सुबहें बहुत देर से उगतीं। सारा शहर आंखें फाड़े हमें घूरता। पलट कर हमें दोबारा देखता, जैसे पहचानने के कयास लगा रहा हो। शहर किसी शक्की जासूस जैसा था। हालांकि हम सारे कयासों और अनुमानों की पोटली हवा में उड़ाते और खूब घूमते। डर तो जैसे हम किसी पुड़िया में बांधकर किसी नाले में फेंक आए थे। नाले में फेंकना हमारी विवशता थी। शहर में कोई नदी नहीं थी। हम रोज सोचते थे, बल्कि दिल से चाहते थे कि शहर में कोई पानी वाली जगह होती, तो हम वहां बैठकर बातें करते। पानी वाली जगहों पर शायद अधिक प्रेम होता होगा। बहती लहरों की शीतलता प्रेमियों तक पहुंच जाती होगी।

तुम्हारी जिंदगी में मुझसे पहले भी कई लड़कियां रहीं थीं। पांच, छह, सात या इससे ज्यादा। मन का जुड़ाव तो दो से ही रहा, शायद। बाकी, तो यूं ही चलता रहा। यह बात मुझे ज्यादा उलझा देती थी कि महज शरीर पाने के लिए कैसे किसी से बंधा जा सकता है? मिल गया शरीर, फिर आगे क्या? शरीर का उन्माद कब तक रिश्ते को बचाए रख सकता है? शायद यही वजह रही होगी कि तुम एक के बाद एक रिश्ते बदलते रहे। मैं उन सारी स्त्रियों के बारे में जानना चाहती थी। जब तुम बहुत खुश होते, तो मैं तुम से पूर्व प्रेमिकाओं के बारे में जानने का प्रयास भी करती। मैं सब कुछ जानना चाहती थी। उनका चेहरा, उनकी आंखें, उनकी बातें और उनका प्रेम। तुम कुछ नहीं कहते थे। कैसे भी बात को गोल कर जाते। कोई दूसरी बात शुरू कर देते। शायद तुम उन लड़कियों की, जिनसे कभी तुम्हारा सम्बन्ध रहा था, बातें करते हुए असहज महसूस करते थे। कहीं ऐसा तो नहीं था कि तुम उन्हें भूल गए थे? मुझे बहुत अजीब खयाल आते थे, जब तुम मेरा हाथ पकड़ते थे। मेरा हाथ अपने हाथों में रखते हुए क्या तुम ने कभी अपनी पूर्व प्रेमिकाओं की अंगुलियां याद नहीं की होंगी? क्या कभी तुम ने मेरी आंखों में कोई और आंखें महसूस नहीं की होंगी? कई बार यह सोचना मेरे लिए असहनीय हो जाता कि जैसे तुम अभी मुझे गले लगा रहे थे, कभी उन्हें भी लगाया था? जैसे अभी मुझे चूमना चाहते थे, कभी उन्हें चूमना चाहते रहे होगे! और आज उनके बारे में कुछ नहीं कहते। एक प्रेमिका के तौर पर, यह मेरे लिए खुशी की बात थी, लेकिन मेरे भीतर का स्त्री मन विचलित हो जाता। दूसरी ओर यह भय भी उपजने लगता कि इस तरह तो एक दिन तुम मुझे भी भूल जाओगे। नई प्रेमिका के बालों में अपनी अंगुलियां फिराते हुए कोई सुन्दर कविता कहोगे। वह मेरे बारे में पूछेगी और तुम्हे कुछ याद नहीं आएगा। फिर तुम उसे भी यही कहोगे कि तुम उससे इतना प्रेम करते हो, कि पुरानी प्रेमिकाएं याद ही नहीं रहतीं। क्या तुम इतनी आसानी से भूल जाओगे हंसी में मुंद जाती मेरी बड़ी – बड़ी आंखें, मेरी लम्बी अंगुलियां, मेरा यूं ही देर तक बतियाते रहना?

इन दिनों अखबारों में कितनी ही ऐसी खबरें छपती हैं, जिनमें लिखा होता है कि लड़की को शादी का झांसा देकर फंसाए रखा गया। तब कई मर्तबा यह खयाल आता कि कहीं तुम भी ऐसा ही तो नहीं कर रहे। लेकिन अगले क्षण, वह खयाल चला भी जाता क्यूंकि मैं जानती थी कि तुम मुझ से बहुत प्रेम करते थे। लेकिन यह तो उन सारी लड़कियों को भी लगता होगा, जिन्हें लड़कों ने प्रेम में बांधकर ठगा होगा। तभी तो वे उनके सुनहरे वायदों के आगे सब भूल जाती होंगे। अक्ल पर पर्दे पड़ जाते होंगे। क्या तुम्हारा प्रेम भी ऐसा ही कोई छल था? यहां प्रेम था, विश्वास था, लेकिन हमेशा साथ रह पाने का वायदा नहीं था। तुम ऐसे किसी भी वायदे से बहुत दूर थे। मैं जब भी तुम से इस विषय में कहते – कहते रो पड़ती, तुम मजबूरियों में लिपटी हंसी हंस जाते। तुम्हारा यूं हंसना मेरे रोने से भी अधिक बदसूरत और दयनीय लगता था! तुम रोना चाहते थे, लेकिन खुद को रोक लेते थे।

इतना भय था, फिर भी तुम मुझ से छूटते ही नहीं थे। अधिक लिपटते जाते थे। घेरते जाते थे। मेरा जीवन एक गोल घेरे से अधिक कुछ नहीं था और इस घेरे में तुम ही खड़े होते थे। प्रेम जीवन को विस्तार देता है, लेकिन मेरा जीवन संकरा होता जा रहा था। तुम मुझ पर किसी पुरानी शराब जैसा असर कर रहे थे। नशा उतरता ही न था। रेत की तरह मैं अपनी मुट्ठी से फिसलती जाती थी। कई बार सोचती कि आज तुम से कह ही दूंगी कि अब खत्म करो यह सब। जब तुम जिंदगी भर मेरे साथ ही नहीं रह सकते, मुझे कोई कमिटमेंट नहीं दे सकते, तो इस सब का क्या अर्थ? लेकिन बात गले तक आकर अटक जाती। मुझे सब संवाद में बहुत प्रवीण मानते थे, लेकिन वहां सारी कुशलता धरी की धरी रह जाती। हर बार यही सोचकर लौट आती कि अगली बार जरूर कह दूंगी। वह अगली बार कभी नहीं आता था।

सड़क। सड़क से जाती कई गलियां। हर गली में सैकड़ों मकान। हर मकान में कितने ही लोग। मकानों से निकल कर सड़क पर आते सारे लोग। सड़कें सभी को मिला देती थीं। तारकोल की इन सड़कों पर इतनी गाड़ियों की भीड़ और लोगों का ऐसा हुजूम उमड़ता कि कई दुपहरियों में पसीना पोंछने के बाद सड़क किनारे लगी बैंच पर बैठ कर मुझे खुद को एहसास दिलाना होता कि मैं भी हूं। इतनी भीड़ को देख कर लगता कि यदि हम दोनों न भी रहें, तो किसी को क्या फर्क पड़ेगा। हमारे चले जाने पर भी कुछ नहीं बदलेगा। तुम्हारे सामने होने पर यह सारा अनूठा विज्ञान मैं तुम पर उंडेलती। तुम भी प्रेम में सराबोर, सारा ज्ञान समेट लेते। तुम से कहीं बहुत – बहुत दूर चलने को कहती। इतना दूर, जहां किसी गाड़ी के किसी हॉर्न की आवाज हम तक ना पहुंचे। जहां सुबहें सिर्फ चिड़ियाओं की आवाजों से उगती हों। जहां नन्हे बच्चे भारी बस्ता लादे स्कूल नहीं जाते हों। जहां न किसी की घूरती आंखें हों, न हमारे चरित्र का आकलन करने वाले बुद्धिजीवी। जहां कोई हम से नहीं पूछता कि हमारा सम्बन्ध क्या है। जहां हम जावन किसी कैदगाह या प्रयोगशाला की तरह जीने को बाध्य नहीं होते। मैं किसी पहाड़ी स्कूल में पढ़ा लेती। तुम भी कहीं काम तलाश लेते। वहां जीने को ज्यादा सामान नहीं चाहिए। हम कम में भी आसानी से गुजारा कर लेते। सच्चे और खुश रह पाते। यह सब खयाल उपजते रहते और फिर हमारे मिलने का समय खत्म हो जाता। मैं घर लौट आती, जहां मां, पिता, भैया, दीदी, पड़ौसी, रिश्तेदार, समाज सब कुछ सिलसिलेवार याद आ जाता। तुम्हे भी घर परिवार, सपने, महत्वाकांक्षाएं, पैसा याद आ जाता। पहाड़ी पर सोचे गए उस जीवन की योजनाएं वहीं रह जाती, जहां हम ने उन्हें छोड़ दिया था।

हम में से अधिकतर को घर रहना इसीलिए रास आता रहा है, क्यूंकि वहां मां हैं। मां नहीं होतीं, तो घर तुरन्त कमरों और दीवारों में तब्दील हो जाता। मां के अतिरिक्त घर की चारदीवारी में सब कुछ बहुत व्यवहारिक था। नसीहतों का ढेर था – नौकरी तलाशो, पैसा बनाओ, गाड़ी खरीदो, बड़ा घर बनाओ, समाज में रुतबा बढ़ाओ, शादी करके घर बसाओ, बच्चे पैदा करो और फिर और पैसा बनाओ। अपने आस – पास हर शख्स की जिंदगी इतनी मिलती – जुलती थी कि मुझे समझ नहीं आता था कि वैज्ञानिक क्लोन्स और रोबोट्स क्यों बना रहे हैं! क्या हम पहले ही रोबोट और मशीन नहीं बन चुके हैं? अधिकांश लोग भीड़ में भेड़ों की तरह जी रहे थे। लेकिन जब वे दुकान पर कपड़े खरीदने जाते थे, तो कुछ अलग दिखाने को कहते। जो बिल्कुल हट कर हो और किसी और ने नहीं पहना हो। जहां, हमारे पास सब कुछ कमोबेश एक सा था, हम कपड़ों के रंगों और डिजाइनों से खुद को अलग महसूस कराने में नाहक मसरूफ थे। एक कतार में जीते – जीते सब के चेहरे भी इतने समान लगने लगे थे कि उन्हें अलग से पहचाना जाना मुश्किल था।

यदि यह सारी अनर्गल बातें र्मैं किसी से कहती, तो मुझ पर व्यवहारिक जीवन से जुड़ा सारा ज्ञान उलट दिया जाता। इससे बचने के लिए मैने यह कभी किसी से नहीं कहा। हालांकि इतना कहा जा सकता है कि उन सब के पास कहने को ऐसा कुछ था, जो उन्होने भी किसी भय या पूर्वाग्रह के कारण किसी से नहीं कहा होगा। एक शाम, हम दोनों ने एक ऐसा मंच तैयार करने का विचार भी किया था, जहां सारे लोग ऐसी बातें एक – दूसरे से साझा कर सकें। ऐसी बातें, जो मन के किसी हिस्से में लम्बे समय से  मौजूद हैं और बाहर आने को व्याकुल हों। यह मंच किसी भी सामूहिक स्थल जैसे बगीचे, किसी खुली – खाली जगह या किसी बड़े हॉल में बनाया जा सकता था। ऐसे मंचों के लिए कोई अपना घर कभी नहीं देता। घर किटी पार्टियों और जातिगत सम्मेलनों के लिए आरक्षित थे।

पिता जी जब आचार्य रजनीश ‘ओशो’, कार्ल माक्स या डेल कारनेगी को पढ़ते, तो मुझे पक्का यकीन हो जाता था कि अगले दिन वे जरूर बदल जाएंगे और कुछ क्रांतिकारी बातें करने लगेंगे। वे जाति जैसे निरर्थक पक्षों से स्वयं को मुक्त कर लेंगे। मैं, थोड़ा निराश होती, जब पिता को अगली सुबह भी बिल्कुल उसी तरह जाति के प्रति आसक्त पाती। मां कहती कि मैं प्रेम विवाह कर सकती हूं, लेकिन लड़का कम से कम किसी निम्न जाति या दूसरे धर्म का न हो। शायद उससे कुछ पहले या बाद के घण्टों में सारी मांएं अपनी युवा बेटियों से यही कह रही होती होंगी। मैं उनसे तेज आवाज में पूछती – क्या प्रेम जाति पूछ कर किया जाता है? वह मुझे ‘बेवकूफ’ घोषित कर समूची बहस को खारिज कर देती। वह जिस मासूमियत से मुझे बेवकूफ कहतीं, मैं उन पर नाराज नहीं हो पाती।

व्यवहारिक जीवन की सारी नसीहतों के मध्य, तुम किसी लहर की तरह ठहरते। बिल्कुल भारहीन। मिथ्या आदर्शों और निश्चित परिभाषाओं से बिल्कुल मुक्त। तुम्हे न किसी की घूरती नजरें परेशान करती। न ही तुम किसी के आकलनों या उलाहनों से विचलित होते। तुम सारी नियमावलियों और समय सारणियों की पोटलियां किसी जंगल में फेंक आए थे। तुम उस मानसिकता का मूर्त रूप थे, जिसे वास्तविक अर्थों में जीने का दुस्साहस मैं केवल कल्पनाओं में कर पाती थी। तुम उतने स्वतन्त्र थे, जितना मैं होना चाहती थी। इस तरह  ‘मैं’ ‘तुम’ में खुद को देखती थी। तुम ‘मैं’ में रुपान्तरित हो जाते थे। अमूमन यही कारण था कि बिल्कुल अलग व्यक्तित्व वाले हम दोनों भीतर से एक जैसे थे और प्रेम कर पाते थे।

बड़े होने की प्रक्रिया में हम बचपन की सहजता छोड़ते जाते हैं। मोटी – मोटी किताबें पढ़ कर गम्भीर व सयाने होने लगते हैं। बाकी काम जिंदगी खुद ही कर देती है। और जीते – जीते एक समय ऐसा आता है, जब हम दोबारा उतने सहज होना चाहते हैं, जितना बचपन के दिनों में थे। सहज हो सकने के लिए कई लोग आध्यात्म मार्ग का सहारा लेते हैं। इस प्रकार हम वहीं लौटने के लिए प्रयास करते हैं, जहां से हम ने जीवन यात्रा का आरम्भ किया था।

तुम तो जानते ही हो कि मैं वह बात सबसे आखिर में कहती हूं, जो सबसे शुरू में कही जानी चाहिए थी। स्वाभाविक रूप से लिखने की प्रक्रिया में निर्धारित क्रम टूट जाता है। निश्चित रास्ते मुझे कभी न याद रहे न रास आए। जैसे, मैं तुम्हे यह बताना चाहती थी कि कल शाम ही मैं और निष्काम हनीमून से लौटे हैं। ‘घूमना’ भी लिख सकती हूं, लेकिन ‘हनीमून’ शब्द सुन कर तुम्हे जरा अधिक बुरा लगेगा। मेरा दुष्ट मन थोड़ा सा तो यह कामना करता ही है कि तुम्हे बुरा लगे! रोना आए। रातों को नींद न आए। खैर, हम पूरा केरल घूम कर आए। निष्काम शिमला जाना चाहते थे, लेकिन मैने केरल जाने को कहा। मेरे कहते ही वे मान गए। बहुत ध्यान रखते हैं मेरा। बाहर हों, तो फोन करके पूछते रहते हैं। आज वह ऑफिस गए हैं। पहले ही बहुत छुट्टियां ले ली थीं न! निष्काम बहुत सधे हुए, सुलझे हुए इंसान हैं। सबसे बहुत अच्छी तरह बर्ताव करते हैं। ससुराल में तो मैं केवल पांच दिन ही रही। फिर, हम लोग केरल चले गए। और दस दिन घूम कर कल शाम ही लौटे हैं। अब कोई काम ढूंढना शुरू कर दूंगी। जिंदगी यूं घर बैठ कर तो नहीं गुजारी जा सकती। जिस फ्लैट में हम रहते हैं, बहुत खूबसूरत है। हर कमरा एयर कंडीशंड। हर चीज वहीं है, जहां उसे होना चाहिए। निष्काम को चीजों को इधर – उधर फैलाए रखना बिल्कुल पसंद नहीं है। बाहर एक छोटा सा बगीचा है। यहां गुलाब और दूसरे पौधों की कुछ क्यारियां हैं। मुझे यहां बैठना बहुत अच्छा लगता है। हमने सुबह की चाय यहीं पी। फिर धूप आ जाती है, तो सारा दिन अन्दर ही रहना होता है। बस एक ही कमी है। किसी भी कमरे में खिड़कियां नहीं हैं। रात को जब मैने कविता लिखना शुरू ही किया था और निष्काम मुझे बांहों में भरने लगे, कुछ घुटन सी होने लगी। गला रुंधने लगा। एकदम रुलाई फूट पड़ी। निष्काम तो बिल्कुल चौंक गए। पूछते रहे – क्या हुआ। मैने कह दिया – कुछ नहीं, मां की याद आ रही है। कुछ खास नहीं। अभी ठीक हो जाउंगी। फिर यहां – वहां, एक से दूसरे कमरे में खिड़की के पास बैठने के लिए दौड़ती रही। तभी गौर किया कि यहां एक भी खिड़की नहीं है।

तुम जानते हो मेरे लिए किसी से यूं अपना अकेलापन और उदासी बांटना इतना आसान नहीं है। मेरे जैसे  लोग, जब किसी भय के सामने आ खड़े होने के कारण, बिना खिड़कियों वाले घरों में बंद हो जाते हैं, तो सच कहती हूं, सांसें उखड़ने लगती हैं और जार – जार रोना आता है।

कल निष्काम का जन्म दिन है। सोचा था, उनके लिए कुछ लिखूंगी। उन्हें बहुत अच्छा लगेगा। वे हैं भी बहुत प्यारे। और देखो, जब लिखना शुरू किया और तुम्हारा खयाल आया, तो सब तुम्हे ही लिख दिया। अब लिख ही डाला है, तो दिल से चाहती हूं कि तुम इसे जल्द से जल्द पढ़ लो। सारी रात सो न पाओ और मेरी तरह रो दो। इतना तो तुम जानते ही हो कि तुम ठहरे मर्द, जिनके पास यूं सब के सामने रो पड़ने के बाद मां की याद या आंख में कचरा गिर जाने जैसा कोई बहाना भी नहीं होता!

तुम्हारी यादों से अधिक इस अफसोस में भी आंखें भीगती रहीं कि क्या हम दोनों कहीं गायब नहीं हो सकते थे? क्या शहर को इतनी फुर्सत थी कि हमारे जैसे आम लोगों के बारे में पन्द्रह – बीस मिनट से अधिक सोचे या बात भी करे? गायब हुआ जा सकता था। तुम अकेले गायब हो सकते थे लेकिन मेरे साथ कम से कम मां, बाबा और दीदी को भी गायब होना पड़ता। जानते हो, इतने सारे लोग एक साथ गायब नहीं हो सकते। इसीलिए मुझे इस घर में आना पड़ा, जहां एक भी खिड़की नहीं है। और अब इस आस को पकड़ कर ही जिंदा रहा जा सकता है कि धीरे – धीरे इस सब की आदत पड़ जाएगी। मुमकिन है, इसी में खुशी भी अपना रास्ता बना लेगी। तुम ने महसूस किया होगा कि कभी बत्ती चली जाती है और अंधेरा हो जाता है, तो हम एकबारगी परेशान हो उठते हैं। रोशनी के लिए यहां – वहां दौ दौड़ते हैं। लेकिन देखो, कुछ देर बाद अंधेरा हम में उतरने लगता है। वह हमें और हम उसे समझने लगते हैं। फिर वह विचलित नहीं करता। फिर न अंधेरों से कोई शिकायत शेष रहती है और न ही रोशनी के आने की प्रतीक्षा।

त – हल्का

डेली न्यूज के बुधवार परिशिष्ट ‘खुशबू’ में प्रकाशित (27 नवम्बर 2013) 

 

(स्टोरी इस लिंक पर उपलब्ध है)

http://dailynewsnetwork.epapr.in/1…/khushboo/27-11-2013

 

कण – गण – गुरू

डेली न्यूज के बुधवार परिशिष्ट ‘खुशबू’ में प्रकाशित (5 सितम्बर 2013) 

क्या शिक्षा को किसी परिधि में बांधा जाना संभव है! क्या गुरू का कोई निश्चित पैमाना हो सकता है! क्या शिक्षक का ओहदा किसी उम्र में कैद हो सकता है! क्या दुहराती पीठ के बल चलती वह बुढ़िया याद नहीं, जिसने आप को सतत संघर्ष की प्रेरणा दी! क्या उस नन्हे शिक्षक को आप भूल सकते हैं, जिसके खालिस भोलेपन ने आप को जमीन से जुड़े रहने की सीख दे डाली! शिक्षक महज उस वर्ग के व्यक्तियों को नहीं कहा जा सकता, जिन्होंने हमें औपचारिक व तयबद्ध रूप से जीवन का पाठ पढ़ाया। सच्चे अर्थों में, वह हर शख्स गुरू होता है, जो हमें गाहे – बगाहे कोई अहम सबक सिखा गया हो। जीवन के पहले क्षण से अंतिम श्वांस तक हम कितना कुछ जानते – सीखते हैं, लेकिन ऐसे गुरू, जिनका पीठ थपथपाना हमें उन्नति की राह पर ले गया हो, अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। पग – पग पर हमें जीवन संघर्ष को प्रेरित करने वाले गुरूओं को नमन। हर उस शख्स को धन्यवाद, जो अनजाने में ही हमारा शिक्षक हो गया और हमें भान भी नहीं हुआ। 

दुविधा में राह दिखाता है शिक्षक

औसत अध्यापक किताबें खंगाल कर जानकारी उंडेलता है। श्रेष्ठ शिक्षक अक्षरों के ज्ञान को जीवन की कंटीली सच्चाइयों से जोड़ देता है। गुरू उन तमाम आदर्शों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। असमंजस के क्षणों में वह तुम में विश्वास फूंकता है। जब डर तुम्हारे पीछे होता है, गुरू पीठ पर थपकी देता है। जब अकेले पड़ जाते हो, वह तुम्हारा हाथ थाम लेता है।

समाजशास्त्री डॉ मृदुला भटनागर के अनुसार, ‘शिक्षक’ बहुत व्यापक शब्द है। इस शब्द में कई पक्ष समाहित होते हैं। वास्तव में शिक्षक वह है, जिससे हम कुछ महत्वपूर्ण सीख पाएं हों। सीखने का यह क्रम औपचारिक रूप से स्कूल, कॉलेज या संस्थान के किसी शिक्षक के जरिए हो सकता है अथवा किसी अनौपचारिक माध्यम से भी। राजस्थान विश्वविद्यालय (समाजशास्त्र विभाग) में असोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर मृदुला कहती हैं कि शिक्षक एक औपचारिक पद भी है। यही कारण है कि टीचर्स डे का दिन संस्थागत शिक्षकों तक ही सिमट कर रह गया है। शिक्षक ज्ञान का सृजन करता है। लेकिन इस औपचारिक शिक्षक – शिष्य संबंध के इतर भी कई स्तरों पर हमें जीवन में मार्गदर्शन मिलता है। यहां, हम सहज ही जीवन आदर्श सीख जाते हैं। डॉ मृदुला के शब्दों में शिक्षक वह है, जो व्यक्ति को दुविधा में सही राह दिखाए। जो उसे आगे बढ़ने को दिशा –निर्देश दे।

गुरू करता है व्यक्तित्व निर्माण

पहली गुरू है मां। गुरुत्व में अगले चरण पर होते हैं पिता। फिर भी माता – पिता से अधिक सम्मान का अधिकारी शिक्षक को माना गया है। कारण, माता – पिता जीवन देते हैं, जबकि गुरू जीवन की कला। वरिष्ठ साहित्यकार सुशीला श्योराण के अनुसार यह व्यक्ति के संस्कारों पर निर्भर करता है कि वह संस्थागत शिक्षकों को ही महत्व देता है या सहज हासिल होने वाले ज्ञान को। सुशीला कहती हैं कि वर्तमान दौर में, महज अक्षर ज्ञान की बजाय संपूर्ण व्यक्तित्व निर्माण पर ध्यान दिया जा रहा है। ऐसे में, कक्षाओं और किताबों के इतर, खेल – कूद, गायन, नृत्य के दौरान भी शिक्षकों से बहुत कुछ ऐसा सीखने को मिलता है, जो हमारा चरित्र निर्माण करता है। गुरू तो गुरू है, फिर चाहे वह किसी भी स्थान या पद पर हो। सच्चा गुरू वही है, जिससे आप जिंदगी से जुड़ी छोटी – बड़ी परेशानियों के बारे में बात कर सकें और मार्गदर्शन पा सकें।

जीवन है सीखने का सतत सिलसिला

भोर के उजालों से अंधियारी रातों तक, कितने पहर गुजरते हैं! हर दिन हमें एक नए तजुर्बे से भर जाता है। हम कतरा – कतरा सीखते हैं। हम टुकड़ा – टुकड़ा समझते हैं। आई बी एम कंपनी में असोसिएट सिस्टम इंजीनियर चांदनी अग्रवाल कहती हैं कि विवाह के बाद पति ही उनके शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं। चांदनी मानती हैं कि पति उनका सच्चा व सटीक आकलन करते हैं। यह प्रक्रिया उन्हें बेहतर बनने में मदद करती है। परिवार के अतिरिक्त, दफ्तर और साथ काम करने वाले भी बहुत अहम सीख देते हैं। यूं, सबसे अधिक स्व आकलन से बड़ा कोई शिक्षक नहीं। जब आप खुद को आइने में देखते हैं, तो अपनी खामियां सबसे अधिक ईमानदारी से देख – परख पाते हैं।

सीखने की प्रक्रिया सहज व प्राकृतिक है। अध्यापन क्षेत्र में कार्यरत अंशु खण्डेलवाल जीवन को अनुभवों का सतत सिलसिला ही मानती है। औपचारिक व अनौपचारिक, दोनों ही तरीकों से व्यक्ति सीखता है। अंशु की राय में, एक शिक्षक आपको नीतिबद्ध रूप से सिखाता है। वह आपको जीवन में आने वाली चुनौतियों के लिए पहले से तैयार कर देता है, जिससे आप संभल जाते हैं।

शिक्षक को कहें शुक्रिया

सफलताएं सुन्दर होती हैं। विफलताएं अति सुन्दर होती हैं। संघर्ष के सर्द दिन वो यकीं भर जाते हैं, जो हम में पहले नहीं था। उन कठिन दिनों को कहें, शुक्रिया! वैदिक एस्ट्रोलॉजर व टैरो कार्ड रीडर रेखा जे सिंह जीवन में कठिन दिनों को सच्चा शिक्षक मानती हैं। रेखा के अनुसार, जब वे बीते दौर को याद करती हैं तो महसूस होता है कि मुश्किल वक्त में लोगों के अनपेक्षित व्यवहार ने ही जीवन का असल पाठ पढ़ाया। इस अनुभव से वे मजबूत बन उभरीं। रेखा मानती हैं कि कक्षाओं में मिलने वाला ज्ञान अहम है, लेकिन कोरे – खालिस सबक तो इस से परे ही हासिल होते हैं। हमें उन का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिन्होंने हमें कुछ सिखाया हो। चाहे वह अस्सी बरस का बुजुर्ग हो या पांच साल का बच्चा। अमूमन हम अहंकार पालते हुए उन लोगों का मूल्य नहीं समझते। समझते हैं, तो जाहिर नहीं करते। टीचर्स डे के मौके पर ऐसे सभी लोगों को धन्यवाद कहें, जो आपके सच्चे शिक्षक रहे हों। 

अलग होता है शिक्षक से संबंध

शिक्षक के चोले में कई रंगों के रिश्ते पनपते हैं। कई किस्म के नाते सांसे लेते हैं। वह प्रेरक होता है, आलोचक भी। मां सा दुलारता है, तो पिता सा सख्त भी हो जाता है। भेल कंपनी में कार्यरत अर्पिता शर्मा के अनुसार शिक्षक या गुरू शब्द का जिक्र होने पर बरबस ही हम स्कूल – कॉलेज के शिक्षकों को याद करने लगते हैं। हम आदतन ऐसा करते हैं। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। वे ही होते हैं, जिन्हें हम शिक्षक जान – मान कर सीखते जाते हैं। घर – परिवार में माता – पिता की भूमिका शिक्षक से अलग है। दोस्तों से, परिचितों से जो सीख पाते हैं, वह बिल्कुल अनौपचारिक होता है। अर्पिता के मुताबिक शिक्षक से हमारा संबंध पृथक होता है। हम उनका सम्मान करते हैं। हम उनसे अपना जीवन साझा करते हैं, लेकिन एक निश्चित सम्मानपूर्ण दूरी व सीमा बनी रहती है। इस मर्यादा को हम कभी नहीं लांघते। आप गुरू के मित्र नहीं हो सकते। मित्र मित्र है और गुरू गुरू।

सच्चे अर्थों में गुरू वह है, जो व्यक्ति को पहले से श्रेष्ठ बना सके। जो तुम में पनप रहे प्रतिभा के बीज को पौधे का आकार दे सके। जो तुम में उगते भय को साहस का मार्ग दिखा सके। जो तुम्हारे भीतर पलती रचनात्मकता को सृजन का रूप दे सके। और सबसे अधिक व अहम, तुम्हे सुन्दर इंसान बना सके।

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उल्लास, उमंग, उत्साह, उजास के साथ रिश्तों में घुल जाने के पांच दिन

डेली न्यूज के बुधवार परिशिष्ट ‘खुशबू’ में प्रकाशित (30 अक्टूबर 2013) 

सजावट से भरपूर बाजार। रंग – बिरंगी चमकीली लड़ियों से सजी दुकाने। मिट्टी के दीयों के साथ रखीं रंगीन मोमबत्तियां। पीले लड्डुओं और पारम्परिक मिठाइयों के बीच अपनी जगह पर फैले हुए सुन्दर चॉकलेट के डिब्बे। दुकान से बाहर निकलते हुए एक चॉकलेट के आकर्षक कलेवर पर नजर पड़ती है, जिस पर लिखा है – ‘रिश्तों का टाइम’।

हां, वाकई! यह मौका है रिश्तों को प्रेम करने का। खूब खुशियां मनाने का। सजने – संवरने और सुन्दर हो जाने का। अंधियारों को परे सरकाती रोशनी और उजालों से घर भरने का। क्यूंकि, यह शुभ अवसर है दीपावली का।

पृथ्वी के प्रादुर्भाव का उत्सव

दीपावली पर्व का मनाया जाना पृथ्वी से सम्बन्धित है। विख्यात ज्योतिषाचार्य डॉ विनोद शास्त्री (प्राध्यापक, संस्कृत विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय) उल्लेख करते हैं कि कार्तिक अमावस्या को पृथ्वी का प्रादुर्भाव हुआ तथा पृथ्वी को महालक्ष्मी रूप माना जाता है। इस प्रकार, दीपावली के रूप में पृथ्वी के उद्भव को चहुं ओर उत्सव की भांति मनाया जाता है। डॉ विनोद शास्त्री कहते हैं कि दीपावली का पर्व पांच दिनों पर केन्द्रित है और प्रत्येक दिन का अपना महत्व है। स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण मानते हुए, लक्ष्मी से पूर्व धन्वन्तरि की अर्चना की जाती है। अन्नकूट, पृथ्वी के पूजन का प्रतीक रूप है। पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से गोवर्धन की पूजा होती है। इसके उपरान्त, भैया दोज के दिन बुद्धि व रचनात्मकता की वृद्धि के लिए सरस्वती की आराधना की जाती है।

सम्पन्नता व समृद्धि का शुभारम्भ

‘दीपावली’ शब्द कानों में पड़ते ही एक छवि आकार लेती है, जिसमें चहुं ओर सब कुछ सुन्दर है, सुसज्जित है। यह उत्सव दरिद्रता के नाश और समृद्धि के शुभारम्भ का संकेत है। यही वजह है कि घर के किसी भी कोने में पड़े कूड़े – कचरे अथवा अनुपयोगी सामान को दरिद्रता का प्रतीक मानते हुए बाहर बुहारा जाता है। इस संदर्भ में ज्योतिष विद् राजेश अग्रवाल कहते हैं कि जिस शुभ तिथि में श्री राम चौदह वर्षों का वनवास काटने के पश्चात् अयोध्या लौटे व राज कार्य सम्भाला, उसे ही दीपावली के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए यह कहना उचित होगा कि दीपावली, समस्याओं की समाप्ति और सम्पन्नता के शुभारम्भ का प्रतीक है। इसी मानसिकता के साथ घर – परिवारों में मिष्ठान्न बनाए जाते हैं और दीपक जलाए जाते हैं। प्रकाश और प्रसन्नता का प्रसार होता है। दीपावली के बाद, विवाह व अन्य प्रकार के मांगलिक कार्य भी प्रारम्भ हो जाते हैं। यह भी खरीदारी किए जाने का प्रमुख कारण है।

सेहत के लिहाज से महत्वपूर्ण

यदि कोई भी तिथि धार्मिक रूप से शुभ मानी जाती है, तो अवश्य ही स्वास्थ्य पक्ष भी महत्वपूर्ण स्थान पर होता है। इस सम्बन्ध में ज्योतिष विद् राजेश अग्रवाल उल्लेखित करते हैं कि यह रितु परिवर्तन का समय होता है। सर्दियों की कंपकंपाहट महसूस होने लगती है। संक्रमण और बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए, घरों में साफ – सफाई की जाती है। अन्नकूट के शुभ दिवस पर बाजरे इत्यादि का स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है। बाजरे में लौह तत्व पाया जाता है, जो शरीर को गर्म रखता है। अन्नकूट यह इंगित करता है, कि अब गर्म भोजन करने का समय आ गया है। इस प्रकार, दीपावली से जुड़ी परम्पराएं ना केवल धार्मिक रूप से महत्ता रखती हैं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।

स्त्री ही रचती है इस उल्लास को

दीपों के इस महापर्व पर रसोईघरों में सामान्य सब्जियों के छौंक का स्थान ले लेती हैं मठरी – गुझियों की मीठी महक। संगमरमरी आंगन पर साकार होती हैं सुन्दर रंगोलियां। फीके रंग सिमट जाते हैं और घरों की शोभा बढ़ाते हैं नई चादरें, पर्दे और चटाइयां। एक बरस से एक ही रंग – रूप में लिपटा रहा घरौंदा नए सामान के मध्य, ताजगी भरी सांसें लेता है। लेखिका व कवियित्री सरोज सिंह दीपावली को रोशनी और उल्लास का पर्व मानती हैं। रोजमर्रा की बोझिलता को छिटकते हुए, दीपावली उत्साह का संचार करती है। सरोज कहती हैं कि इन दिनों, स्त्रियां घर की साज – सजावट में जुटी रहती हैं। इस अवसर पर स्त्रियां स्वयं भी सुन्दर दिखने के लिए नए कपड़े लेती हैं व श्रंगार में कोई कमी नहीं रखतीं।

बमबारी नहीं बस फूलझड़ी

उजियारे के प्रतीक रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व सब प्रकार से उत्साह का प्रसार करता है। फिर लाखों – करोड़ों के पटाखे स्वाहा कर हम पर्यावरण को क्यूं नुकसान पहुंचाएं? हमें यह समझने की जरुरत है कि इन पटाखों की कर्कश आवाजों और स्याह धुंए से न श्री राम प्रसन्न होंगे, न ही देवी लक्ष्मी। बच्चों को भी यह समझाया जा सकता है कि पटाखों की बजाय वे फूलझड़ियां इत्यादि जलाकर खुशी मनाएं। इ

किसी को दे सकें तो दें मुस्कान

उत्सव में खुशियां केवल स्वयं तक सिमटी नहीं रह सकतीं। ज्यों ही हम अपनी दुआएं किसी को तोहफे की शक्ल में लपेट कर भेजते हैं, पर्व अपने वास्तविक महत्व को छू जाता है। दीपावली मनाने का अर्थ मात्र इतना भर नहीं है कि हम अपने घर धन – धान्य से भर लें अथवा दीप जलाकर अपने आशियानों को रौशन कर लें।

कम से कम एक मर्तबा अपने घर में झाड़ – पौंछ करने वाली बाई का चेहरा याद करें। क्षण भर के लिए दुकानों पर चाय परोसने वाले छोटू को देखिए। इस मर्तबा, दीपावली पर उसे एक जोड़ी नए कपड़े या मिठाइयों का डिब्बा दे आएं और देखिए, उसके चेहरे की रूखाई कैसे हंसी में बदल जाती है! वह भले ही आपको शुक्रिया कहना नहीं जानता हो, लेकिन उसके देखने भर को देखिए। वह खुशी उस खुशी से कहीं गुना अधिक होगी, जो आप और हम हर दीपावली पटाखे जलाकर या नए कपड़े पहन कर पाना चाहते हैं।

(स्टोरी इस लिंक पर उपलब्ध है)

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तुम्हारे खुरदुरे हाथ

सुबह आठ बजे ही दफ्तर पहुंच गई हूं। नया केबिन जो मिला है आज। सब कुछ बिल्कुल साफ – सुथरा। जमा हुआ। हर चीज, अपनी जगह पर। व्यवस्थित। जैसा, मैं हमेशा चाहती थी। सामने कांच की टेबल पर अखबार रखे हैं। खिड़की के पास कांच के गमले में पौधा रखा है। पौधों की मौजूदगी ताजगी बनाए रखती है ना! काम में गुम और फाइलों से घिरे रहने के दौरान याद आ जाता है कि पौधों का रंग हरा होता है। तुम्हारे अलावा किसे कह सकती हूं कि आज अपना केबिन मिलने पर मैं कितनी खुश हूं। तुम सामने होते, तो दौड़ कर तुम्हारे गले ही लग जाती। यहां दफ्तर में कोई बधाई भी देता है, तो जबरन खुद को संयत रख कहना पड़ता है – “ओह शुक्रिया। क्या फर्क पड़ता है। केबिन हो या डेस्क, काम ही तो करना है आखिर। अब, किसी को अपनी अपार खुशी जाहिर कर दूं, तो वह मुझे कितना अपरिपक्व समझेगा। सोचेगा, कि कैसा बचपना भरा है अब तक। बड़े होने का एक नुकसान यह भी है कि हम छोटी – छोटी बातों और उपलब्धियों पर अपना बहुत खुश होना यूं दिखा नहीं सकते। दफ्तर में तो बिल्कुल नहीं। फिर, मैं तो अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित रहती हूं। हां, तुम्हारे सामने गंभीरता ओढ़ने की कोई जरूरत नहीं। तुम तो बखूबी जानते हो पल – पल में मेरा बच्चा बनना और अगले मिनट बूढ़ा – सा महसूस करना। दुनिया भर की आंकलन करती आंखों के आगे हर वक्त जो बोझ लादे रखना होता है, तुम्हारे सामने आकर सारा भार उतर जाता है। कुछ वैसे ही, जैसे बच्चे घर में कदम रखते ही स्कूल बैग पलंग पर डाल देते हैं। बिना एक मिनट की भी देर किए।

कुछ फाइलों का बकाया काम आज ही पूरा करना है। डेस्कटॉप पर काम शुरू करने की कवायदों के बीच कुछ खलल उपज रहे हैं। कुछ धुंधले अक्स के आकार में। कुछ यादें मन के दरवाजों पर आ धमकी हैं। बिना दस्तक दिए। जैसे वे हमेशा आ खड़ी होती हैं। ना वक्त देखती हैं ना जगह। एक बारगी यदि अतीत के संदूक पर पड़े ताले टूटने लगे, तो उन्हें रोकना मुमकिन नहीं हो पाता। फिर एक – एक कर सब यादों की परतें उघड़ने लग जाती हैं। वह शाम रह – रह कर याद आ रही है। जेहन के किसी कोने में वह शाम बिल्कुल वैसे ही रखी है, जैसे उस दिन घटी थी। बिना किसी धुंधलाहट या भुलावे के।

अमूमन आधा घण्टे से हम दोनों साथ ही बैठे थे। एक ही टेबल पर। लेकिन आपस में जरा भी बात नहीं। बीती रात को एक – दूसरे से हमारी नाराजगी ने इतना उफान ले लिया था, कि रात भर जरा भी सो नहीं सके थे। सारी रात एक – दूसरे पर आरोपों के बाद खामोशियों का लंबा सिलसिला चला था। किसी तरह मिलने का तय कर अगली सांझ साथ बैठ भी गए, लेकिन बातचीत की पहल ना तुम करते थे, ना ही मैं अपने अहंकार को सरका कर बात शुरू कर पा रही थी। आधा घण्टे से तुम टेबल पर रखे पेपर नैपकिन को तोड़ – मरोड़ कर कभी नाव कभी हवाई जहाज बना कर वक्त काटने की नाकाम कोशिशों में लगे थे। और मैं अपने मोबाइल स्क्रीन में आंखें धंसा कर बैठी थी। इनबॉक्स में रखे सारे मैसेज भी चार मर्तबा पढ़ डाले थे। फिर भी घड़ी की सूइयां थीं कि आगे ही न बढ़ती थीं। आखिर, चुप रहने की हिम्मत ने जवाब दे दिया, तो मैने ही कुछ धीमे से कहा था – अपने हाथ देखे हैं तुम ने?

तुम पेपर नैपकिन में उलझे हुए ही बोल पड़े – हां। इसमें देखना क्या है! मेरे ही हाथ हैं।

अरे, कितने मैले और काले लग रहे हैं। अंगुलियों के बीच वाले हिस्से को देखो, जरा। कितना सख्त लग रहा है। बिल्कुल, जैसे बूढ़ों के हाथ होते हैं। अगर कोई सिर्फ तुम्हारे हाथ देखे, तो तुम्हारी उम्र का अंदाजा लगाएगा कम से कम पचास बरस। इस बार मेरी आवाज पहले से कुछ तेज थी।

क्या कह रही हो! तुम्हे हंसी आ गई थी। तुम बिल्कुल उन्मुक्त हंसने लगे थे। यूं हंसता देख मुझे तुम पर लाड़ – सा आने लगा, लेकिन खुद को रोकते हुए मैने बातचीत की गम्भीरता को जबरन जकड़े रखा। तब तक चाय भी आ गई थी।

मैने जरा नाराजगी दिखाते हुए कहा – तुम किसी भी बात पर गम्भीर ही नहीं होते। बस, हंसने लगते हो। हाथ देख कर लगता है जैसे मजदूरी करते हो।

अरे, बाबा। मजदूरी नहीं करता, लेकिन सारी दुपहरी यहां – वहां दौड़ता रहता हूं। बार – बार ग्लव्स पहनने का वक्त नहीं मिलता। सच कहूं, तो जल्दबाजी में दस्ताने जैसी चीज जरा भी याद नहीं पड़ती। अब तुम हाथों को जाने दो और चाय का कप थामो। तुम ने फिर माहौल को हल्का करने की कोशिश में कहा।

फिर वही। हर बात को हवा में उड़ा दो। इसमें तो महारत हासिल है तुम्हे। मेरी किसी बात पर जरा भी ध्यान नहीं देते। अब साथ – साथ इतना वक्त जो गुजर गया है। भला मेरी बातों से तुम्हे क्यों फर्क पड़ेगा अब। शुरुआती दिनों में यह कहती, तो अब तक सौ मर्तबा हाथ किसी हैंड वॉश से रगड़ – रगड़ कर धो चुके होते। मेरी आवाज की तेजी जस की तस थी।

ठीक है, घर जाते ही सबसे पहले हाथ अच्छे से साफ करूंगा। तुमने वायदा करने के अंदाज में कहा था।

सिर्फ साफ करने से क्या होगा! और तुम्हारा साफ करना तो मैं जानती ही हूं।

तो और क्या करूं? तुमने झट से सवाल खड़ा कर दिया।

देखो, एक बाल्टी पानी गर्म करना। गुनगुने होने तक ही। उसमें शैम्पू, नमक, नींबू के रस की कुछ बूंदे डाल देना। फिर, उसमें अपने हाथ कम से कम पन्द्रह मिनट तक डाले रखना। और जब इतना सब कर ही लो, तो अपने पैरों पर भी जरा दया कर देना। मैने मैनिक्योर की पूरी विधि उंडेल दी थी।

ठीक है। पक्का। रात को सोने से पहले जरूर कर लूंगा। ना करूं, तो तुम फोन करके याद दिला देना। अब ठीक है। मुझे आश्वस्त करने और बात को खत्म करने के अंदाज में तुम ने कहा था।

ठीक है। तुम्हारी आंखों में झांकते हुए मैने कहा था।

तुम भौहें ऊपर करते हुए चिढ़ाने के अंदाज में बोले – अब मुस्कुराने का क्या लोगी, बाबा!

बहुत देर से रोकी हंसी आखिर फूट ही पड़ी।

आज भी ठीक वैसे ही हंसी दबी हुई रखी है, जो सिर्फ तुम्हारे सामने ही यूं फट पड़ सकती है। यूं तो हम हंसी और रुलाई, एक उम्र तक दोनों को गले में रोके रखना सीख ही लेते हैं। फिर भी कोई एक शख्स तो ऐसा होता ही है, जिसके सामने यह रोकथाम की कोशिशें खुद ब खुद खत्म हो जाती हैं। डेस्कटॉप पर दिखता धुंधलका छंटने लगा है। तुम्हारे हाथ बन रहे हैं वहां। बिल्कुल तुम्हारे हाथ। सांवले – काले से। सख्त – खुरदुरे से। मेरे लाख कहने पर भी तुम ने कभी उन्हें मुलायम या साफ करने की कवायद में वक्त नहीं गंवाया। मालूम है, यहां सभी के हाथ बहुत साफ दिखते हैं। बिल्कुल चमकते से। जैसे, अभी अभी हथेलियों पर महंगी क्रीम से मेहनत की गई हो। इन चमकते हाथों से आकर्षित तो हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें छूने को मन नहीं करता। एक अजीब – सा डर पनप जाता है कि उनकी चमक फीकी ना पड़ जाए। इस चमक के बीच तुम्हारे हाथों का खुरदुरापन ऐसे ही याद आता है जैसे नए शहर की भीड़ में मां का खयाल। जैसे धूप के सायों में मुट्ठी – भर छांव। जानते हो, तुम्हारे हाथों की शक्ल उभरते ही जो अगली चीज याद आती है, वह है पहाड़। तुम्हारे हाथों और पहाड़ों में कुछ एक – सा है। मालूम नहीं, क्या। तुम्हारे हाथ, जिन्होंने कितनी ही बार मुझे जाते – जाते रोक लिया था। आंसूओं को गालों पर लुढ़कने से पहले थाम लिया था। अब सोचती हूं, कि तुम शायद  इसीलिए उन्हें ज्यादा साफ नहीं करते थे कि कहीं मेरे आंसू धुल ना जाएं। अगली बार मिलो, तो मुझे सारे आंसुओं के निशां दिखाना। हम उनकी वजहें ढूंढेंगे। जिन बातों पर कभी रोए थे, इस बार हंसेंगे। अभी बस इतना ही कह सकती हूं – इन उजली परतों के बीच बहुत याद आ रही हैं,  दुनिया में सबसे अधिक नर्माहट देने वाले तुम्हारे सबसे खुरदुरे हाथ!

जड़ता की जाति

 

जनसत्ता में प्रकाशित (16 अक्टूबर 2013)

 

 

 

(स्टोरी इस लिंक पर उपलब्ध है)

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